नई दिल्ली। देशभर के अस्पतालों में गंभीर मरीजों के इलाज की व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और मानकीकृत करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को ICU से जुड़ी निर्धारित व्यवस्थाओं को तय समय के भीतर लागू करने को कहा है। आदेश का दायरा सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ निजी और अन्य संबंधित अस्पतालों तक भी है। सुप्रीम कोर्ट ने उन ICU बुनियादी ढांचा संबंधी आवश्यकताओं के लिए नौ महीने की अधिकतम समयसीमा तय की है, जिनके लिए पहले दिशानिर्देशों में 12 महीने तक का समय निर्धारित किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबी समयसीमा को घटाकर नौ महीने किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अस्पतालों में गंभीर मरीजों के लिए जरूरी सुविधाओं को लंबे समय तक लंबित न रखा जाए। ICU व्यवस्था में केवल मशीनें और कमरे पर्याप्त नहीं हैं। प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने ICU विशेषज्ञों, प्रशिक्षित MBBS डॉक्टरों, नर्सों और अन्य आवश्यक स्वास्थ्यकर्मियों की भर्ती प्रक्रिया तुरंत शुरू करने और उसे छह महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि ICU में उपलब्ध चिकित्सा उपकरणों को संचालित करने और गंभीर मरीजों की लगातार निगरानी करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ मौजूद रहे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकृत ICU ढांचे में गहन चिकित्सा सेवाओं को मुख्य रूप से Level I, Level II और Level III के रूप में व्यवस्थित किया गया है। इन स्तरों के बीच उपचार की जटिलता, उपलब्ध उपकरण, विशेषज्ञता और मानव संसाधन के आधार पर अंतर रखा गया है। मई 2026 में अदालत ने इस तीन-स्तरीय व्यवस्था से जुड़े न्यूनतम मानकों को मंजूरी दी थी। Level I को बुनियादी गंभीर देखभाल के लिए जरूरी न्यूनतम मानकों से जोड़ा गया है, जबकि उच्च स्तर के ICU में अधिक जटिल और विशेषज्ञ उपचार की क्षमता अपेक्षित है। सभी व्यवस्थाओं के लिए नौ महीने की समयसीमा नहीं है। कुछ जरूरी सुविधाओं को इससे पहले उपलब्ध कराने का प्रावधान है। अदालत से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, बेडसाइड यूटिलिटी, आवश्यक उपकरणों, प्रयोगशाला सेवाओं और अन्य निर्धारित सुविधाओं के लिए तीन महीने की समयसीमा रखी गई है। इनमें मरीजों की निगरानी, ऑक्सीजन सपोर्ट और आपातकालीन चिकित्सा से संबंधित आवश्यक व्यवस्थाएं शामिल हैं। वहीं, संक्रमण नियंत्रण और सुरक्षा से जुड़े कुछ मानकों को तत्काल लागू करने पर जोर दिया गया है। ICU में मरीजों की स्थिति लगातार बदल सकती है। इसलिए केवल डॉक्टरों की संख्या ही नहीं, बल्कि प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की पर्याप्त उपलब्धता भी बेहद महत्वपूर्ण मानी गई है। दिशानिर्देशों में मरीज की गंभीरता के आधार पर नर्सिंग अनुपात तय किया गया है। निगरानी वाले मरीजों के लिए लगभग 1:2 से 1:3 का अनुपात और वेंटिलेटर पर मौजूद मरीज के लिए 1:1 नर्सिंग व्यवस्था का प्रावधान बताया गया है। इसका मकसद गंभीर मरीजों की लगातार निगरानी और समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप सुनिश्चित करना है। दिशानिर्देशों में Level-1 ICU की जिम्मेदारी ऐसे विशेषज्ञ के अधीन रखने को प्राथमिकता दी गई है जिसके पास मान्यता प्राप्त पोस्टग्रेजुएट मेडिकल योग्यता हो। इसमें एनेस्थीसिया, मेडिसिन, पल्मोनरी मेडिसिन, पीडियाट्रिक्स या इमरजेंसी मेडिसिन जैसी विशेषज्ञताओं का उल्लेख किया गया है। यदि उपलब्धता की समस्या हो तो दिशानिर्देशों में वैकल्पिक चिकित्सकीय व्यवस्था का भी प्रावधान रखा गया है। देश के कुछ राज्यों ने अदालत के सामने यह चिंता रखी कि पहाड़ी, दुर्गम और दूरदराज इलाकों में ICU की निर्धारित व्यवस्था तैयार करने में अतिरिक्त समय लग सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे विशेष मामलों में अतिरिक्त समय की संभावना खुली रखी है, लेकिन इसके लिए संबंधित क्षेत्र को वास्तविक स्थिति और काम पूरा करने की स्पष्ट अतिरिक्त समयसीमा बतानी होगी। अदालत ने संकेत दिया है कि केवल देरी के आधार पर अनिश्चित अवधि की छूट नहीं दी जाएगी। केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपनी अनुपालन स्थिति की रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करनी है। रिपोर्टों की समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, अनुपालन रिपोर्ट जमा करने के लिए 5 नवंबर 2026 की तारीख तय की गई है और मामले को आगे 16 नवंबर को सुना जाना है। इससे यह स्पष्ट है कि अदालत केवल दिशानिर्देश जारी करके मामले को छोड़ने के बजाय उनके वास्तविक क्रियान्वयन की निगरानी भी कर रही है। ICU सुविधाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी अचानक शुरू नहीं हुई है। इस विषय पर न्यायिक कार्यवाही वर्ष 2016 से चल रही है। बाद के वर्षों में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, चिकित्सा विशेषज्ञों और अन्य पक्षों से सुझाव लिए गए और ICU सेवाओं के लिए एक समान न्यूनतम मानकों की दिशा में काम आगे बढ़ाया गया। मई 2026 में अदालत ने ICU के तीन स्तरों और उनसे संबंधित न्यूनतम आवश्यकताओं को मंजूरी दी थी। अब सितंबर में जारी निर्देशों के जरिए इनके क्रियान्वयन की समयसीमा को अधिक स्पष्ट किया गया है। इन निर्देशों का उद्देश्य ICU सेवाओं में मौजूद बुनियादी अंतर को कम करना है। यदि अस्पताल निर्धारित मानकों के अनुसार इंफ्रास्ट्रक्चर, उपकरण और प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध कराते हैं, तो गंभीर मरीजों के लिए शुरुआती स्थिरीकरण और लगातार निगरानी की क्षमता बेहतर हो सकती है। साथ ही, समान न्यूनतम मानकों से मरीजों और उनके परिवारों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी अस्पताल में उपलब्ध ICU किस स्तर की सुविधा प्रदान करता है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अस्पताल, राज्य स्वास्थ्य विभाग और अन्य संबंधित संस्थाएं इन निर्देशों को जमीन पर कितनी प्रभावी ढंग से लागू करती हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों ने ICU सेवाओं के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, उपकरण, विशेषज्ञ डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता को एक निश्चित समयसीमा से जोड़ दिया है। प्रमुख समयसीमाओं में निर्धारित इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अधिकतम नौ महीने, महत्वपूर्ण स्वास्थ्यकर्मियों की भर्ती के लिए छह महीने और कुछ आवश्यक सुविधाओं के लिए तीन महीने शामिल हैं। अब मुख्य चुनौती इन मानकों को कागज से अस्पतालों तक पहुंचाने की है। अदालत की निगरानी और राज्यों की अनुपालन रिपोर्ट आने के बाद यह तस्वीर और स्पष्ट होगी कि देशभर में ICU व्यवस्था में कितना वास्तविक बदलाव आया है।ICU इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए अधिकतम नौ महीने
डॉक्टरों और नर्सों की भर्ती छह महीने में
तीन स्तरों में ICU की व्यवस्था
कुछ जरूरी सुविधाओं के लिए तीन महीने
मरीज और नर्स के अनुपात पर भी जोर
Level-1 ICU में विशेषज्ञता पर जोर
पहाड़ी और दूरदराज क्षेत्रों को लेकर क्या कहा गया?
राज्यों को देनी होगी प्रगति रिपोर्ट
यह मामला लंबे समय से अदालत के सामने है
इसका अस्पतालों और मरीजों पर क्या असर हो सकता है?
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का ICU व्यवस्था पर बड़ा निर्देश, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टाफ के लिए तय हुई समयसीमा





