सरकार के निर्देश का नहीं हो रहा है पालन पदाधिकारी भी नहीं रिसीव करते हैं फोन
समयबद्ध सेवा कानून फेल, वर्षों से लंबित आवेदन, जनता बेहाल
गरीब जनता रिश्वत लेने वाले कनीय पदाधिकारी व कर्मचारी से हैं परेशान
30 दिन का वादा, फिर सालों का इंतजार जिम्मेदार कौन?
संजय सिंह/ मो. सफी
पलामू : अगर हम बात सरकार के निर्देश और उसके पालन की बात करते हैं तो पलामू जिला में बेमानी साबित होती है। क्योंकि यहां के वरीय पदाधिकारी के बारे में तो हम नहीं कह सकते हैं लेकिन अन्य पदाधिकारी, कर्मचारी और अन्य स्टाफ बिना पैसा लिए किसी का कोई भी काम नहीं कर रहे हैं। जनता त्राहिमाम है। लेकिन दुख की बात तो तब होती है जब वरीय पदाधिकारी ऐसे लोगों पर लगाम नहीं लगा पाते हैं। इससे उनकी छवि और सरकार की छवि भी खराब होती है। जिले में लागू झारखंड राज्य सेवा देने की गारंटी अधिनियम (आरजीटीएस) 2011 का उद्देश्य आम लोगों को सरकारी सेवाएं तय समय सीमा में उपलब्ध कराना था, लेकिन पलामू में यह कानून पूरी तरह बेअसर नजर आ रहा है।
जिले के विभिन्न प्रखंड और अंचल कार्यालयों में बड़ी संख्या में आवेदन महीनों नहीं, बल्कि वर्षों से लंबित पड़े हैं। इससे आम जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
*समय सीमा तय, फिर भी नहीं हो रहा पालन*
सरकार ने कई जरूरी सेवाओं के लिए स्पष्ट समय सीमा तय की है
* जाति, आवासीय और आय प्रमाण पत्र: 30 दिन
* राशन कार्ड (नया): 15–30 दिन
* राशन कार्ड में नाम जोड़ना: 7–15 दिन
*शस्त्र लाइसेंस*
* पुलिस जांच रिपोर्ट: 7 दिन
* अंतिम निर्णय: 60 दिन
*भूमि म्यूटेशन*
* सामान्य मामला: 30 कार्य दिवस
* विवादित मामला: 90 कार्य दिवस
नियम के अनुसार तय समय में सेवा देना या आवेदन को कारण सहित अस्वीकार करना अनिवार्य है।
*पलामू में जमीनी हकीकत*
जिले में इन नियमों का पालन नहीं हो रहा है
* राशन कार्ड में नाम जोड़ने के आवेदन 2 से 4 वर्षों से लंबित
* जाति, आय और आवासीय प्रमाण पत्र के लिए महीनों तक इंतजार
* म्यूटेशन मामलों में भी अनावश्यक देरी
* कई आवेदन न तो स्वीकृत किए जाते हैं, न ही अस्वीकृत
*जनता में नाराजगी*
स्थानीय लोगों का कहना है
> “सरकार ने समय सीमा तय की है, लेकिन अधिकारी उसका पालन नहीं करते। गरीब और जरूरतमंद लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ रही है।”
लोगों का आरोप है कि बिना सिफारिश के काम समय पर नहीं होता।
*जवाबदेही पर सवाल*
कानून में प्रावधान है कि देरी होने पर संबंधित अधिकारी पर जुर्माना लगाया जा सकता है और आवेदक अपील कर सकता है, लेकिन पलामू में इन नियमों का पालन नहीं हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कानून को सख्ती से लागू किया जाए तो भ्रष्टाचार और लापरवाही पर रोक लग सकती है।
> सरकार के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद पलामू में समयबद्ध सेवा कानून दम तोड़ता नजर आ रहा है। जरूरत है कि जिला प्रशासन इस पर कड़ी कार्रवाई करे, ताकि आम लोगों को उनका अधिकार समय पर मिल सके।
*झारखंड मुक्ति मोर्चा के पलामू जिला अध्यक्ष राजेंद्र सिन्हा*
ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के आवेदन पर निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई नहीं होती है, तो उसे वरीय पदाधिकारियों से संपर्क करना चाहिए। उन्होंने माना कि व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि कुछ लोग लालचवश पैसे का लेन-देन करने लगते हैं, जिससे प्रक्रिया प्रभावित होती है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार पूरी तरह निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है। यदि किसी भी आवेदन पर समय सीमा के भीतर कार्रवाई नहीं होती है, तो संबंधित व्यक्ति सीधे उनसे मिल सकता है, ताकि उसकी समस्या का समाधान सुनिश्चित किया जा सके।
*भाजपा जिला अध्यक्ष अमित तिवारी*
ने कहा कि पूरे झारखंड में सिस्टम फेल हो गया है। अफसरशाही हावी है, जनता का काम नहीं हो रहा और नियम-कानून का पालन नहीं हो रहा। उन्होंने चेतावनी दी कि हालात नहीं सुधरे तो जनता सड़कों पर उतरेगी।
*पलामू में अफसरशाही हावी, बिना पैसे नहीं हो रहा काम, अधिकारी फोन उठाने से भी कतराते*
जिले में इन दिनों अफसरशाही पूरी तरह हावी नजर आ रही है। आम लोगों का आरोप है कि बिना पैसे के कोई भी काम नहीं हो रहा है और अधिकारी आम जनता की समस्याओं को लेकर गंभीर नहीं हैं।
सरकार के स्पष्ट निर्देश हैं कि निर्धारित समय सीमा के अंदर सभी आवेदनों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। कई मामलों में लोग महीनों से कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, फिर भी उनके काम लंबित पड़े हैं।
इस संबंध में जब संवाददाता ने जिले के उपायुक्त और अनुमंडल पदाधिकारी से संपर्क करने की कोशिश की, तो उन्होंने फोन तक रिसीव नहीं किया। हालांकि कॉल रिसीव नहीं करना अलग बात है, लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक यह है कि सरकारी निर्देशों का पालन नहीं हो रहा है।
जनता परेशान है, सिस्टम पर भरोसा कमजोर पड़ता जा रहा है, और जिम्मेदार अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से दूर नजर आ रहे हैं। अगर जल्द स्थिति नहीं सुधरी, तो यह प्रशासनिक लापरवाही आम लोगों के लिए और भी बड़ी परेशानी बन सकती है।
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*झारखंड में कहाँ है अबुआ राज? गरीबों की हालत बदतर, हर जगह पैसों की मांग*
कौन कहता है कि झारखंड में अबुआ राज और गरीबों की सरकार है? हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है।
गरीब आज भी अपने हक के लिए दर-दर भटक रहा है।
कोई वृद्धा पेंशन के लिए महीनों से इंतजार कर रहा है,
कोई विकलांग पेंशन के लिए परेशान है,
किसी का राशन कार्ड में नाम नहीं जुड़ पा रहा,
तो कोई जमीन के मोटेशन और नकल के लिए चक्कर काट रहा है।
हालत यह है कि लोग अपने ही अधिकार के काम के लिए महीनों नहीं, बल्कि वर्षों तक भटकते रहते हैं।
पलामू जिले में तो स्थिति और भी गंभीर है। ऐसा लगता है कि अधिकारी पूरी तरह लापरवाह होकर “तेल डालकर सोए” हुए हैं,
और उनके अधीनस्थ कर्मचारी खुलेआम काम के बदले पैसों की मांग कर रहे हैं।
अगर यही “गरीबों की सरकार” है, तो फिर गरीब आखिर जाए तो जाए कहाँ?






