नई दिल्ली, 16 अक्टूबर 2026। मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत तलाक की अलग-अलग प्रक्रियाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने विवाह-विच्छेद की विभिन्न व्यवस्थाओं में एकसमान प्रक्रियात्मक सुरक्षा और स्पष्ट दिशा-निर्देश लागू करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार तथा अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इस मामले में महिलाओं के अधिकारों, कानूनी समानता और तलाक की प्रक्रिया में निष्पक्षता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक के विभिन्न तरीकों के लिए ऐसे नियम निर्धारित किए जाएं, जिनसे प्रभावित महिलाओं को उचित कानूनी संरक्षण मिल सके। याचिका में तलाक की प्रक्रिया के दौरान निष्पक्षता, पति-पत्नी के बीच सुलह की संभावना और महिलाओं के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है। मामले में विशेष रूप से उन प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए गए हैं, जिनके माध्यम से अदालत के बाहर एकतरफा तलाक दिया जा सकता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ऐसी व्यवस्थाओं के लिए स्पष्ट और प्रभावी सुरक्षा उपाय जरूरी हैं, ताकि किसी भी पक्ष के अधिकारों की अनदेखी न हो। इस याचिका में ‘तलाक-ए-हसन’ की कानूनी वैधता को भी चुनौती दी गई है। इस प्रक्रिया में पति तीन महीने की अवधि के दौरान प्रत्येक महीने एक बार तलाक का उच्चारण करता है। यदि इस दौरान वैवाहिक संबंध फिर से स्थापित नहीं होते, तो तीसरे उच्चारण के बाद तलाक प्रभावी होने की व्यवस्था बताई जाती है। याचिकाकर्ता ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 को भी उस सीमा तक चुनौती दी है, जहां तक इसे तलाक-ए-हसन की मान्यता से संबंधित माना गया है। याचिका में संबंधित प्रावधानों की संवैधानिक वैधता की जांच करने और महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग की गई है। याचिका में विवाह-विच्छेद के मामलों में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया गया है। इसमें आर्थिक सुरक्षा, सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया जैसे पहलुओं पर ध्यान देने की मांग की गई है। इसके अलावा, मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बहुविवाह से जुड़े कुछ पहलुओं पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने मौजूदा पत्नी की स्वतंत्र और पूरी जानकारी के आधार पर दी गई सहमति तथा उसके अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानूनी उपाय सुनिश्चित करने की मांग की है। इन सभी मुद्दों पर अंतिम निर्णय अदालत की सुनवाई और संबंधित पक्षों के जवाबों के बाद ही सामने आएगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस याचिका को तलाक-ए-हसन की वैधता को चुनौती देने वाली एक अन्य लंबित याचिका के साथ जोड़ दिया है। अब केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों के जवाब मिलने के बाद अदालत मामले के कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर आगे विचार कर सकती है। गौरतलब है कि वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक घोषित किया था। मौजूदा मामला उससे अलग तलाक की अन्य प्रक्रियाओं और उनके लिए आवश्यक कानूनी सुरक्षा उपायों से संबंधित है। इसलिए आने वाली सुनवाई यह स्पष्ट करने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है कि संबंधित प्रक्रियाओं के लिए किस तरह के कानूनी मानक और सुरक्षा प्रावधान जरूरी हैं। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका में उठाए गए सभी सवालों पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। केंद्र सरकार और अन्य पक्षों का जवाब आने तथा आगे की सुनवाई के बाद ही मामले की अगली दिशा स्पष्ट होगी। कॉपीराइट संबंधी नोट: यह समाचार उपलब्ध रिपोर्टों में दिए गए तथ्यों के आधार पर स्वतंत्र भाषा और नए वाक्य-विन्यास में तैयार किया गया है। इसमें आरोपों और याचिका की मांगों को अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं बताया गया है। स्वतंत्र पुनर्लेखन अपने आप में किसी भी संभावित कानूनी या कॉपीराइट दायित्व से पूर्ण छूट की गारंटी नहीं देता।तलाक की प्रक्रियाओं के लिए समान सुरक्षा की मांग
‘तलाक-ए-हसन’ की वैधता भी चुनौती के दायरे में
महिलाओं और बच्चों के अधिकारों पर भी जोर
सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या होगा?
मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से मांगा जवाब






