शिक्षक दिवस विशेष : गूगल ज्ञान दे सकता है, संस्कार नहीं - गुरु ही बनाते हैं इंसान
शिक्षक दिवस विशेष : गूगल ज्ञान दे सकता है, संस्कार नहीं - गुरु ही बनाते हैं इंसान
• शिक्षक-छात्र रिश्ता; कोई खून का बंधन नहीं, फिर भी खून के रिश्ते से गहरा.
• पहला 'क' और कंधे पर रखा हाथ, आज भी याद है.
• असली सम्मान, अपने गुरुजनों को कभी न भूलना.
अमित कुमार,
रांची एक्सप्रेस ब्यूरो
देवघर : आज *" शिक्षक दिवस "* (05 सितंबर) है, । सुबह से ही स्कूलों में कुछ अलग सी रौनक है, कुछ अलग सी हलचल है। गलियों में सफेद शर्ट पहने बच्चे हाथों में गुलाब लिए दौड़ रहे हैं। किसी के हाथ में खुद से बनाया हुआ ग्रीटिंग कार्ड है, जिस पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा है - "Happy Teachers Day" । किसी की जेब में सिर्फ एक कलम है, लेकिन आंखों में अपने गुरुजनों के लिए अपार सम्मान है। आज का दिन सिर्फ एक तारीख नहीं है, बल्कि एक एहसास है।
आज "शिक्षक दिवस" है। वो दिन जब हर छात्र का सिर अपने आप अपने गुरु के सामने झुक जाता है और दिल से बस एक ही आवाज आती है - "आप न होते तो मैं कुछ भी नहीं होता।"
*भारत में यह दिन "डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन" की जयंती पर मनाया जाता है। एक ऐसे व्यक्ति जिन्होंने खुद एक शिक्षक के रूप में जीवन शुरू किया और देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचे। जब उनके छात्रों ने उनका जन्मदिन मनाना चाहा तो उन्होंने कहा था - "मेरा जन्मदिन मनाने के बजाय इस दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाओ।" तभी से यह परंपरा चली आ रही है।*
कहते हैं, माता-पिता हमें जन्म देते हैं, लेकिन एक गुरु हमें जीवन देता है। यह बात सौ फीसदी सच है।
याद कीजिए अपना पहला दिन... जब पहली बार स्कूल गए थे। नई ड्रेस, नई किताबें, लेकिन आंखों में डर। मां का हाथ छूट रहा था और हम रो रहे थे। तब किसने हमें गले लगाया था? हमारी पहली शिक्षिका ने। उन्होंने आंचल से हमारे आंसू पोंछे थे और कहा था - "डरो मत बेटा, आज हम सभी तुम्हारे साथ पढ़ेंगे और खेलेंगे।"
फिर वो तख़्ती पर पहला 'क' लिखना। हमारी कांपती उंगलियां और उस पर रखा आपका मजबूत हाथ। आपने ही तो हमें कलम पकड़ना सिखाया। पहाड़ा याद नहीं होता था तो आप डांटते थे, मुर्गा बनाते थे, लेकिन उसी डांट के पीछे छिपी होती थी आपकी चिंता - "कहीं मेरा बच्चा पीछे न रह जाए।"
*आज के इस डिजिटल युग में जहां सब कुछ मोबाइल पर मिल जाता है, गूगल हर सवाल का जवाब दे देता है, लेकिन एक बात गूगल कभी नहीं दे सकता - वो है संस्कार। वो है सही-गलत की पहचान। वो है जीवन जीने की कला। ये सिर्फ एक शिक्षक ही दे सकता है।*
हमारे झारखंड, खासकर संताल परगना प्रमंडल के विभिन्न जिलों के पिछड़े इलाकों के गांवों में जाकर देखिए। आज भी ऐसे शिक्षक हैं जो सुबह 05 बजे उठकर, कई किलोमीटर पैदल चलकर, नदी-नाले पार करके स्कूल पहुंचते हैं। स्कूल की छत टपकती है, बेंच टूटी है, ब्लैकबोर्ड पर चॉक नहीं है, लेकिन उनके पढ़ाने का जज़्बा नहीं टूटता।
वे जानते हैं कि अगर वो एक दिन स्कूल नहीं आएंगे तो किसी गरीब आदिवासी बच्चे का भविष्य अंधेरे में चला जाएगा। वे सिर्फ वेतन के लिए नहीं पढ़ाते, वे एक मिशन के लिए पढ़ाते हैं।
*ऐसे ही 15 शिक्षकों को आज रांची के जेपीसी सभागार में राज्य स्तरीय सम्मान मिल रहा है। देवघर-दुमका के 04-04, जामताड़ा के 03, गोड्डा के 02 और पाकुड़-साहिबगंज के 01-01 शिक्षक। ये 15 नाम नहीं, 15 कहानियां हैं संघर्ष, समर्पण और निस्वार्थ सेवा की।*
शिक्षक और छात्र का रिश्ता दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता है। इसमें कोई खून का बंधन नहीं, फिर भी यह खून के रिश्ते से भी गहरा है।
कक्षा में पढ़ाते-पढ़ाते अचानक गुरुजनों का ये सवाल करना- "सुबह खाना खाकर कौन-कौन नहीं आए हो जी..? तुम्हारी आंखें क्यों सूजी हैं?" - लगता था जैसे ये सवाल एक पिता पूछ रहा हो। जब हम परीक्षा से पहले डर से कांपते थे, तो कंधे पर हाथ रखकर कहना - "तुम एक अच्छे छात्र हो, तुम कर लोगे" - बस उसी एक वाक्य में सारी ताकत आ जाती थी।
आपकी वो डांट, वो प्यार, वो आशीर्वाद... सब आज भी याद है।
आज हममें से कई छात्र बड़े हो गए हैं। कोई डॉक्टर बन गया, कोई इंजीनियर, कोई पत्रकार, कोई किसान। अधिकांश शहरों में चले गए, लेकिन जब भी स्कूल की पुरानी घंटी की आवाज याद आती है, तो आपकी याद आ जाती है। और आंखें अपने आप नम हो जाती हैं।
इस शिक्षक दिवस पर सरकार सम्मान दे रही है, स्कूलों में कार्यक्रम हो रहे हैं, लेकिन असली सम्मान क्या है? असली सम्मान है अपने गुरु को कभी न भूलना।
आज एक बार अपनी आंखें बंद कीजिए। अपने जीवन के उस एक शिक्षक को याद कीजिए, जिसने आपको पहली बार कहा था - "तुम ये कर सकते हो।"
अगर वो पास में हैं तो जाकर उनके पैर छू लीजिए। अगर दूर हैं तो एक फोन कर लीजिए। बस इतना कह दीजिए - "आपका हार्दिक धन्यवाद। आपने मुझे इंसान बनाया।"
*क्योंकि गुरु का कर्ज कभी चुकाया नहीं जा सकता, बस जीवन भर उनका ऋणी रहा जा सकता है।*






