तुर्किये। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों और दुनिया भर में इसके गंभीर प्रभावों के बीच संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने वैश्विक नेताओं से बिना देरी ठोस कदम उठाने की अपील की है। तुर्किये में शुरू हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन COP31 के दौरान उन्होंने कहा कि जलवायु संकट से निपटने के लिए अब केवल घोषणाएं और आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं। सभी देशों को अपने उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने के साथ जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित देशों की आर्थिक और तकनीकी मदद भी सुनिश्चित करनी होगी। गुटेरेस ने जलवायु संकट को पूरी मानवता के भविष्य से जुड़ी चुनौती बताते हुए विकसित और विकासशील देशों के बीच सहयोग मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके संदेश का मुख्य उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करना और उन देशों को राहत पहुंचाना है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक नुकसान झेल रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने देशों से कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए प्रभावी नीतियां लागू करने का आग्रह किया। उनका मानना है कि जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भरता कम किए बिना जलवायु लक्ष्यों को हासिल करना कठिन होगा। कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल से होने वाला उत्सर्जन वैश्विक तापमान बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल है। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा, सौर और पवन बिजली, ऊर्जा दक्षता तथा कम कार्बन वाली तकनीकों को तेजी से अपनाने की जरूरत है। गुटेरेस ने देशों से अपने जलवायु लक्ष्यों को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखने और उन्हें समयबद्ध तरीके से लागू करने का संदेश दिया। सम्मेलन में विकासशील और गरीब देशों की आर्थिक स्थिति भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनकर उभरी है। कई देश बाढ़, सूखा, चक्रवात, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और भीषण गर्मी जैसी परिस्थितियों से लगातार प्रभावित हो रहे हैं। इन देशों के पास आपदाओं से निपटने, बुनियादी ढांचे को सुरक्षित बनाने और जलवायु अनुकूल तकनीक अपनाने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं। ऐसे में विकसित देशों से जलवायु वित्त उपलब्ध कराने की मांग महत्वपूर्ण हो गई है। गुटेरेस ने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु संकट में जिन देशों की भूमिका अपेक्षाकृत कम रही है, उन्हें इसके सबसे गंभीर परिणामों का अकेले सामना नहीं करना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से प्रभावित देशों को वित्तीय सहायता, आधुनिक तकनीक और आपदा प्रबंधन की सुविधाएं उपलब्ध कराना जरूरी है। COP31 में ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव और पर्यावरण के अनुकूल विकास को लेकर भी चर्चा महत्वपूर्ण रहने की उम्मीद है। दुनिया के सामने चुनौती यह है कि आर्थिक विकास और ऊर्जा की बढ़ती जरूरतों को पूरा करते हुए प्रदूषण तथा कार्बन उत्सर्जन को कैसे कम किया जाए। इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार, बिजली भंडारण तकनीक में निवेश, स्वच्छ परिवहन और औद्योगिक प्रक्रियाओं में सुधार आवश्यक हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया में विकासशील देशों को पर्याप्त निवेश और तकनीकी सहयोग मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सभी देशों पर समान नहीं पड़ता। छोटे द्वीपीय देशों, कम आय वाले क्षेत्रों और कृषि पर निर्भर आबादी को प्राकृतिक आपदाओं तथा बदलते मौसम का अधिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए जलवायु नीति में केवल उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य ही नहीं, बल्कि प्रभावित समुदायों के पुनर्वास, आजीविका की सुरक्षा और आपदा से हुए नुकसान की भरपाई जैसे विषयों को भी महत्व देना होगा। COP31 सम्मेलन को जलवायु कार्रवाई के अगले चरण के लिए महत्वपूर्ण मंच माना जा रहा है। यहां विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के बीच उत्सर्जन नियंत्रण, जलवायु वित्त, तकनीकी सहयोग और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। गुटेरेस की अपील ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी किसी एक देश या सरकार तक सीमित नहीं है। इसके लिए वैश्विक स्तर पर साझा प्रयास, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और निर्धारित लक्ष्यों पर समयबद्ध कार्रवाई जरूरी है। अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर रहेगी कि COP31 में की जाने वाली घोषणाएं वास्तविक नीतियों और आर्थिक सहयोग में कितनी बदलती हैं।ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती जरूरी
जलवायु आपदाओं से प्रभावित देशों को मिले आर्थिक सहायता
स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव पर रहेगा जोर
जलवायु न्याय और वैश्विक जिम्मेदारी का सवाल
COP31 से दुनिया को ठोस फैसलों की उम्मीद
COP31 सम्मेलन में जलवायु संकट पर संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी, गुटेरेस ने विश्व नेताओं से तत्काल कार्रवाई की अपील; उत्सर्जन कटौती और गरीब देशों को आर्थिक मदद देने पर जोर






