CAG के अनुसार, उपयोगिता प्रमाणपत्र किसी भी सरकारी योजना में खर्च की गई राशि के सही उपयोग का आधिकारिक प्रमाण होता है। इनके लंबित रहने से यह सुनिश्चित करना कठिन हो जाता है कि सार्वजनिक धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अनुसार हुआ या नहीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इतनी बड़ी राशि के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित रहने से वित्तीय अनुशासन, निगरानी व्यवस्था और सार्वजनिक धन के प्रबंधन पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। CAG ने संबंधित विभागों को लंबित प्रमाणपत्र शीघ्र जमा करने तथा वित्तीय नियंत्रण प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता बताई है। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि उपयोगिता प्रमाणपत्रों में देरी से केंद्र प्रायोजित और अन्य विकास योजनाओं की निगरानी प्रभावित हो सकती है तथा भविष्य में नई परियोजनाओं के लिए धनराशि जारी करने की प्रक्रिया पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि, रिपोर्ट प्रशासनिक प्रक्रियाओं और वित्तीय प्रबंधन में सुधार की आवश्यकता की ओर संकेत करती है। राज्य सरकार की ओर से इस संबंध में आधिकारिक प्रतिक्रिया आने के बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट में बिहार सरकार की वित्तीय एवं प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न विकास योजनाओं के लिए जारी की गई ₹92,132.75 करोड़ की राशि के संबंध में राज्य सरकार समय पर उपयोगिता प्रमाणपत्र (Utilisation Certificates - UCs) प्रस्तुत नहीं कर सकी है।
₹92,132 करोड़ के उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित: CAG रिपोर्ट में बिहार सरकार की वित्तीय जवाबदेही पर गंभीर सवाल





