विपक्ष का दावा है कि जिन कंपनियों को पूर्व में अनियमितताओं और संविदा शर्तों के उल्लंघन के कारण ब्लैकलिस्ट किया गया था, उन्हें निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किए बिना राहत दी गई। आरोप है कि इस निर्णय से पारदर्शिता और सरकारी खरीद प्रणाली की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। इसी मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि ब्लैकलिस्ट हटाने का निर्णय नियमों के अनुरूप लिया गया है, तो उससे संबंधित सभी प्रशासनिक आदेश, कानूनी राय और स्वीकृति दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि "जनहित" का हवाला देकर वित्तीय नियमों में कथित ढील दी गई, जिसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है। सरकारी खरीद और निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ब्लैकलिस्टिंग तथा उससे जुड़े निर्णयों में स्पष्ट कारण, उचित प्रक्रिया और जवाबदेही बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे मामलों में दस्तावेजों और निर्णय प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा से ही विवादों का समाधान संभव हो सकता है। हालांकि, इस मामले में सरकार की ओर से आरोपों का खंडन किया गया है और कहा गया है कि सभी निर्णय लागू नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप लिए गए हैं। विपक्ष की मांग और लगाए गए आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष किसी सक्षम जांच अथवा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा.
ब्लैकलिस्टेड कंपनियों पर फिर मेहरबानी? मिशन निदेशक पर नियमों में हेरफेर के आरोप, न्यायिक जांच की मांग तेज
झारखंड की एक प्रमुख सरकारी मिशन परियोजना को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि वर्तमान मिशन निदेशक ने सरकारी नियमों में कथित हेरफेर कर पहले से ब्लैकलिस्ट की जा चुकी छह कंपनियों पर लगी रोक हटाई और उन्हें "जनहित" का हवाला देकर दोबारा सरकारी कार्यों में शामिल कर राज्य की धनराशि आवंटित की।




