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प्रशासनिक अनदेखी या अवैध वसूली की चाबुक? शिवाजी मैदान के पटाखा व्यापारियों की आपबीती



कमरुद्दीन अंसारी 

​मेदिनीनगर। प्रकाश पर्व दीपावली की आहट के साथ ही बाजार जगमगा उठे हैं, लेकिन पलामू प्रमंडल मुख्यालय मेदिनीनगर के शिवाजी मैदान में आतिशबाजी (पटाखा) की दुकान लगाने वाले छोटे-बड़े व्यापारियों की जिंदगी में खौफ, लाचारी और आक्रोश का अंधकार छाया हुआ है। जान जोखिम में डालकर, बारूद के ढेर पर रातें गुजारने वाले इन दुकानदारों ने प्रशासन और कुछ बिचौलियों के गठजोड़ का एक ऐसा सनसनीखेज सच उजागर किया है, जो व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है।
​ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आई यह सच्चाई किसी राजनीतिक दल या नेता का बयान नहीं, बल्कि अपनी गाढ़ी कमाई और जिंदगी दांव पर लगाने वाले आम दुकानदारों का दर्द और जमीनी सर्वे का निचोड़ है।
​नगर निगम की फीस दोगुनी, फिर भी 'सरकारी और गैर-सरकारी' उगाही जारी
​दीपावली के दौरान शहर के शिवाजी मैदान में अस्थायी रूप से पटाखा दुकान लगाने के लिए इस वर्ष कुल 45 लाइसेंसधारी दुकानदारों को अनुमति दी गई है। नगर निगम ने आधिकारिक प्रक्रिया के तहत प्रत्येक दुकानदार से राशि जमा कराई और बाकायदा 94,500 रुपये (कुल राशि) का रसीद भी निर्गत किया।
​दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह है कि बीते वर्ष यह सरकारी शुल्क मात्र 45,000 रुपये था। यानी एक ही साल में शुल्क में अप्रत्याशित बढ़ोतरी कर दी गई। लेकिन दर्द सिर्फ दोगुनी फीस का नहीं है; असली जुल्म तो उस वैध रसीद के पीछे छिपा 'अवैध खेल' है।
​"खास महल, थाना और अनुमंडल के नाम पर अवैध वसूली"
​नाम न छापने की शर्त पर एक व्यथित पटाखा व्यापारी ने व्यवस्था की पोल खोलते हुए बताया:
​"हमसे सिर्फ नगर निगम की फीस नहीं ली जाती। 'खास महल', स्थानीय पुलिस-थाना और अनुमंडल कार्यालय के नाम पर अलग से मोटी रकम की उगाही की जा रही है। हद तो यह है कि कुछ रसूखदार दुकानदार ही इस अवैध वसूली के एजेंट बने हुए हैं और साथी व्यापारियों का शोषण कर रहे हैं। इसके बाद भी जब 'बड़े साहबों' की बख्शीश का फरमान आता है, तो मना करने की औकात किसी में नहीं होती।"
​बारूद का ढेर, चोरों का खौफ और 'शेरशाह सूरी' की तरह पहरेदारी
​तीन दिनों के इस अस्थायी कारोबार के लिए व्यापारियों को महीनों पहले से कर्ज और पूंजी लगाकर तैयारी करनी पड़ती है। बारूद का यह खेल सिर्फ मुनाफे का सौदा नहीं, बल्कि हर पल मौत से खेलने जैसा है।
​दुकानदारों ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि आजकल बढ़ती महंगाई, मंदी और चोरी-चकारी की घटनाओं के कारण उन्हें रात-दिन अपने गोदामों और दुकानों की रखवाली "शेरशाह सूरी की तरह मुस्तैद रहकर" करनी पड़ती है। खौफ इतना है कि बारूद के कट्टों और पेटियों के बीच ही सोना पड़ता है। जरा सी चूक या हादसा न सिर्फ पूरी पूंजी स्वाहा कर सकता है, बल्कि जान भी ले सकता है। इसके बावजूद सुरक्षा के नाम पर प्रशासन की तरफ से सिर्फ औपचारिकताएं निभाई जाती हैं, जबकि वसूली पूरी सख्ती से होती है।
​मंदी की मार और टूटी उम्मीदें
​एक तरफ जहां महंगाई के कारण आम जनता की जेब ढीली है, वहीं दूसरी तरफ बाजार का मिजाज भी पहले जैसा नहीं रहा। बिक्री में भारी गिरावट आई है। जितनी लागत और मेहनत लगती है, उस हिसाब से बचत नाममात्र की रह गई है।
​मुनाफे की आस में बारूद के ढेर पर सो रहे इन दुकानदारों की कमर एक तरफ मंदी तोड़ रही है, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक लालच और बिचौलियों की दबंगई।
​जनता और प्रशासन से सीधे सवाल
​यह रिपोर्ट किसी पार्टी या नेता की आवाज नहीं, बल्कि उन बेबस 45 लाइसेंसधारियों की चीख है, जिनकी मेहनत पर भ्रष्टाचार का दीमक लगा हुआ है।
​क्या जिला प्रशासन और नगर निगम प्रशासन इस अवैध वसूली पर संज्ञान लेगा?
​क्या उन दुकानदारों और बिचौलियों पर कार्रवाई होगी जो अधिकारियों के नाम का डर दिखाकर अवैध पैसे वसूल रहे हैं?
​अपनी जान जोखिम में डालकर शहर की खुशियों में रंग भरने वाले इन व्यापारियों को न्याय और सुरक्षा कब मिलेगी?
​ जिला प्रशासन को अब इस कड़वे सच का जवाब देना ही होगा।