कार्तिक अमावस्या की रात रजरप्पा मंदिर परिसर में तंत्र और भक्ति का होगा महासंगम
प्रदीप बर्मन
रजरप्पा। मां छिन्नमस्तिके की पावन भूमि रजरप्पा में कार्तिक अमावस्या की रात तंत्र, भक्ति और अध्यात्म का दुर्लभ संगम देखने को मिलता है। दीपों की लौ, मंत्रों की गूंज, हवन की लपटें और साधकों की साधना से सिद्धपीठ रजरप्पा की रहस्यमयी रात एक अलौकिक अध्याय बन जाती है। झारखंड के रामगढ़ जिले में दामोदर और भैरवी नदी के संगम पर स्थित यह सिद्धपीठ न सिर्फ एक धार्मिक स्थल है, बल्कि तांत्रिक उपासना का भी अद्भुत केंद्र माना जाता है। कार्तिक अमावस्या की रात यहां हजारों श्रद्धालु, साधक और तांत्रिक देश के कोने-कोने से जुटते हैं, जो मां छिन्नमस्तिके की साधना में पूरी रात लीन रहते हैं। शाम ढलते ही मंदिर परिसर का वातावरण रहस्य और भक्ति में डूब जाता है। हवन कुंड से उठती धुएं की लहरें, दूर जंगलों से आती कलकल ध्वनि और डमरू की गूंज माहौल को रोमांचक बना देती है। हजारों दीपों की रोशनी में नहाया मंदिर परिसर, शक्ति साधना का केंद्र बन जाता है। वहीं मंदिर के दक्षिण छोर में अवस्थित मां दक्षिणेश्वर काली मंदिर में भी काली पूजा को लेकर विशेष उत्साह रहता है।
रातभर एकांत स्थल पर होती है तांत्रिकों की विशेष साधना
काली पूजा की इस पावन रात को तांत्रिक और साधक विशेष साधना के लिए एकांत में जंगलों या नदी तटों पर ध्यान लगाते हैं। कई तांत्रिक भैरवी-दामोदर संगम के किनारे साधना में जुटे रहते हैं। माना जाता है कि इस रात मां की आराधना से तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मंदिर के वरिष्ठ पुजारी नवीन पंडा ने बताया कि यह रात साधना और सिद्धि का दुर्लभ संयोग लेकर आती है। मां छिन्नमस्तिका, महामाया काली का ही रूप हैं और काली पूजा की रात उनकी उपासना अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं रजरप्पा मंदिर
काली पूजा की रात रजरप्पा मंदिर विद्युत सज्जा और पुष्पों से जगमग होता है। यह रात भक्तों के लिए आत्मशुद्धि और साधना का अवसर होती है। इस विशेष अवसर पर मां का विशेष श्रृंगार किया जाता है, रातभर आरती, भोग और महाप्रसाद का आयोजन होता है। झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ सहित देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रत्येक वर्ष रजरप्पा पहुंचते हैं।






