जमशेदपुर स्थित मानगो नगर निगम के मेयर पद के चुनाव परिणाम ने शहर की राजनीति में बड़ा संदेश दिया है। कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार एवं पूर्व स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी सुधा गुप्ता ने शानदार प्रदर्शन करते हुए निर्णायक जीत हासिल की। उन्होंने 42,022 मत प्राप्त कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) समर्थित प्रत्याशी संध्या सिंह को भारी अंतर से पराजित किया। संध्या सिंह को कुल 23,421 वोट मिले। करीब 18 हजार से अधिक मतों के अंतर ने चुनाव को एकतरफा बना दिया।
मानगो क्षेत्र को लंबे समय से भाजपा का मजबूत प्रभाव क्षेत्र माना जाता रहा है। ऐसे में भाजपा समर्थित प्रत्याशी की हार ने पार्टी संगठन और स्थानीय नेतृत्व की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव से पूर्व टिकट वितरण को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया था।
भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष राजकुमार श्रीवास्तव द्वारा अपनी पत्नी को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद पार्टी से इस्तीफा देने की घटना ने कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर दी। वहीं उनके समर्थकों तथा पूर्व भाजपा नेता विकास सिंह के विरोध में उतरने से संगठनात्मक एकजुटता कमजोर पड़ गई। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसी अंदरूनी खींचतान के कारण भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक विभाजित हो गया।
इस चुनाव परिणाम के बाद मानगो क्षेत्र के विधायक सरयू राय की राजनीतिक प्रभावशीलता भी चर्चा का विषय बन गई है। वर्ष 2024 के जमशेदपुर पश्चिम विधानसभा चुनाव में प्रभावशाली जीत दर्ज करने वाले सरयू राय से भाजपा प्रत्याशी को मजबूत समर्थन मिलने की उम्मीद थी, लेकिन निकाय चुनाव में वह पूरी तरह नजर नहीं आया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा और नगर निकाय चुनावों के राजनीतिक समीकरण अलग होते हैं, जहां स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवार की व्यक्तिगत स्वीकार्यता अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार की जीत के पीछे पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की सक्रिय भूमिका को अहम माना जा रहा है। उन्होंने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हुए व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया। बूथ प्रबंधन, महिला मतदाताओं तक पहुंच और स्थानीय समस्याओं को चुनावी मुद्दा बनाने की रणनीति कांग्रेस के पक्ष में गई। परिणामस्वरूप यह जीत केवल चुनावी सफलता तक सीमित नहीं रही, बल्कि कांग्रेस के लिए राजनीतिक मनोबल बढ़ाने वाला संदेश भी बन गई।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि चुनाव मैदान में कई हिंदू एवं आदिवासी उम्मीदवारों की मौजूदगी के बावजूद मतों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में नहीं हो सका। विभिन्न प्रत्याशियों के मत जोड़ने पर भी भाजपा समर्थित उम्मीदवार विजेता से काफी पीछे रहीं। इससे संकेत मिलता है कि मतदाताओं ने स्थानीय मुद्दों और रणनीतिक मतदान को प्राथमिकता दी।
मानगो नगर निगम चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी चुनाव में संगठनात्मक एकजुटता, सही प्रत्याशी चयन और जमीनी समन्वय निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भाजपा के लिए यह परिणाम आत्ममंथन का अवसर माना जा रहा है, जबकि कांग्रेस के लिए आगामी चुनावों से पहले यह उत्साहवर्धक संकेत है। अब राजनीतिक गलियारों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि मानगो का यह जनादेश जमशेदपुर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र और आने वाले चुनावी समीकरणों को किस प्रकार प्रभावित करता है।






