BREAKING NEWS

logo

Advertisement
Advertisement

भारतीय सेना को 2028 के मध्य तक मिलेगा अपना संचार उपग्रह GSAT-7B, सीमावर्ती इलाकों में मजबूत होगी संपर्क व्यवस्था


नई दिल्ली, 20 अक्टूबर 2026। भारतीय सेना की संचार क्षमता को आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण परियोजना पर काम चल रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, सेना के लिए विशेष रूप से तैयार किया जा रहा संचार उपग्रह GSAT-7B वर्ष 2028 के मध्य तक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किए जाने का लक्ष्य है। इस उपग्रह के माध्यम से दूरदराज के सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात सैनिकों, सैन्य इकाइयों और कमांड केंद्रों के बीच सुरक्षित तथा भरोसेमंद संपर्क व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

इस परियोजना को भारतीय सेना की तकनीकी और परिचालन क्षमताओं के विस्तार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आधुनिक युद्ध परिस्थितियों में सुरक्षित संचार व्यवस्था बेहद जरूरी होती है, क्योंकि सैन्य अभियानों के दौरान सूचनाओं का तेजी से आदान-प्रदान, निर्देशों का समय पर पहुंचना और विभिन्न इकाइयों के बीच तालमेल परिचालन सफलता को प्रभावित करता है।

क्या है GSAT-7B उपग्रह परियोजना?

GSAT-7B भारतीय सेना की संचार जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा एक समर्पित संचार उपग्रह है। इसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के माध्यम से प्रक्षेपित किए जाने की योजना है। परियोजना के विकास और निर्माण से जुड़ा काम न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के माध्यम से आगे बढ़ाया जा रहा है।

मार्च 2023 में रक्षा मंत्रालय ने इस परियोजना के लिए NSIL के साथ लगभग 3,000 करोड़ रुपये का अनुबंध किया था। शुरुआती योजना में उपग्रह का प्रक्षेपण नवंबर 2027 के आसपास निर्धारित बताया गया था, लेकिन तकनीकी कारणों से इसमें करीब छह महीने की देरी होने की जानकारी सामने आई है। अब इसके प्रक्षेपण का लक्ष्य 2028 के मध्य तक रखा गया है।

यह समयसीमा उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। अंतिम प्रक्षेपण तारीख की पुष्टि संबंधित सरकारी एजेंसियों की आधिकारिक घोषणा से होगी।

सीमावर्ती क्षेत्रों में कैसे मिलेगी मदद?

भारत की कई सैन्य इकाइयां ऐसे दुर्गम इलाकों में तैनात रहती हैं, जहां पहाड़ों, घने जंगलों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण पारंपरिक संचार नेटवर्क की पहुंच सीमित हो सकती है। ऐसे क्षेत्रों में उपग्रह आधारित संचार प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

GSAT-7B के जरिए सेना को निम्नलिखित क्षेत्रों में लाभ मिलने की उम्मीद है:

  • सुरक्षित संपर्क: सैन्य इकाइयों और कमांड केंद्रों के बीच संचार व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद।

  • दूरदराज के क्षेत्रों में कनेक्टिविटी: ऐसे स्थानों पर संपर्क उपलब्ध कराने में सहायता, जहां सामान्य नेटवर्क सीमित हैं।

  • कमांड और नियंत्रण: सैन्य नेतृत्व तक सूचनाएं पहुंचाने और निर्देशों के समन्वय को मजबूत करना।

  • महत्वपूर्ण सैन्य प्रणालियों का संचार: जरूरत के अनुसार सैन्य प्लेटफॉर्म और अन्य परिचालन प्रणालियों के बीच संपर्क को समर्थन देना।

हालांकि, उपग्रह की वास्तविक परिचालन क्षमता उसके अंतिम तकनीकी विन्यास, ग्राउंड सिस्टम और सेना में एकीकरण पर निर्भर करेगी।

अभी सेना की संचार व्यवस्था कैसी है?

भारतीय सेना फिलहाल अपनी संचार जरूरतों के लिए विभिन्न प्रणालियों का इस्तेमाल करती है। इनमें भारतीय वायुसेना के GSAT-7A उपग्रह की उपलब्ध संचार क्षमता भी शामिल है।

वायुसेना और नौसेना के पास पहले से समर्पित सैन्य संचार उपग्रह हैं, जबकि सेना के लिए अलग उपग्रह की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। GSAT-7B के परिचालन में आने से सेना की अपनी संचार क्षमता बढ़ेगी और उपलब्ध उपग्रह संसाधनों पर निर्भरता को बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जा सकेगा।

इसका उद्देश्य मौजूदा संचार प्रणालियों को पूरी तरह समाप्त करना नहीं, बल्कि सेना की जरूरतों के अनुरूप एक अतिरिक्त और समर्पित क्षमता विकसित करना है।

युद्ध के दौरान उपग्रह संचार क्यों महत्वपूर्ण है?

आधुनिक सैन्य अभियानों में संचार केवल बातचीत तक सीमित नहीं है। सैनिकों की स्थिति से संबंधित जानकारी, परिचालन निर्देश और विभिन्न इकाइयों के बीच समन्वय के लिए भरोसेमंद संचार नेटवर्क आवश्यक होते हैं।

यदि किसी क्षेत्र में जमीनी संचार नेटवर्क क्षतिग्रस्त हो जाए या उसकी सेवाएं बाधित हों, तो उपग्रह आधारित संपर्क वैकल्पिक संचार मार्ग उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है। इससे सेना की संचार व्यवस्था को अधिक मजबूत और लचीला बनाने में सहायता मिल सकती है।

हालांकि, कोई भी उपग्रह प्रणाली पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं होती। उसकी प्रभावशीलता सुरक्षित ग्राउंड टर्मिनलों, साइबर सुरक्षा, सिग्नल सुरक्षा और वैकल्पिक संचार प्रणालियों पर भी निर्भर करती है।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

GSAT-7B परियोजना स्वदेशी अंतरिक्ष और रक्षा तकनीक को बढ़ावा देने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है। भारत लगातार अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम का इस्तेमाल नागरिक जरूरतों के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े उद्देश्यों के लिए भी कर रहा है।

देश में संचार उपग्रहों के विकास, प्रक्षेपण और परिचालन क्षमताओं को मजबूत करने से रणनीतिक क्षेत्रों में विदेशी प्रणालियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही, घरेलू अंतरिक्ष उद्योग, इंजीनियरिंग और उच्च तकनीक वाले विनिर्माण क्षेत्रों को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।

निष्कर्ष

भारतीय सेना के लिए समर्पित GSAT-7B संचार उपग्रह परियोजना देश की सैन्य संचार व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम है। 2028 के मध्य तक इसके प्रक्षेपण का लक्ष्य रखा गया है। यदि परियोजना निर्धारित समयसीमा के अनुसार आगे बढ़ती है, तो सेना को दूरदराज के क्षेत्रों में सुरक्षित संपर्क, बेहतर कमांड और नियंत्रण तथा परिचालन संचार के लिए अतिरिक्त क्षमता मिल सकती है।

अब इस परियोजना की प्रगति, तकनीकी परीक्षणों और प्रक्षेपण की अंतिम तारीख से जुड़े आधिकारिक अपडेट पर नजर रहेगी।