रांची,। राजकीय संस्कृत महाविद्यालय रांची के वरीय शिक्षक डॉ.
शैलेश कुमार मिश्र ने कहा कि गुरु पूर्णिमा-सह-व्यास पूर्णिमा भारतीय
संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो हमें गुरु के महत्व और उनके प्रति
सम्मान की याद दिलाता है। यह पर्व हमें शिक्षा, ज्ञान और नैतिकता के महत्व
को भी समझाता है। गुरु का स्थान समाज में सर्वोपरि है और उनके प्रति सम्मान
और श्रद्धा प्रकट करना हमारा कर्तव्य है। डॉ. मिश्र रविवार को डॉ. श्यामा
प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित गुरु
पूर्णिमा-सह-व्यास जयंती के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में विद्यार्थियों
को सम्बोधित कर रहे थे।
डॉ. मिश्र ने कहा कि गुरु समाज का पथ
प्रदर्शक होता है। महर्षि वेद व्यास के योगदान की चर्चा करते हुए उन्होंने
कहा कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की साधना वेदव्यास के बताए गये मार्ग पर
ही चलकर हो सकती है। अर्थ और काम की साधना धर्मपूर्वक करने की शिक्षा
महर्षि वेदव्यास ने दी है। महर्षि वेदव्यास भारतीय संस्कृति के प्रवक्ता
हैं। उनके द्वारा रचित महाभारत और पुराण भारतीय संस्कृति के धरोहर हैं।
भारतीय जीवन मूल्यों, परम्पराओं और संस्कारों का आश्रय लेकर संकटों से
छुटकारा पाया जा सकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. धनंजय
वासुदेव द्विवेदी ने संस्कृत वाङ्मय के विकास में महर्षि वेदव्यास के
योगदान के पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुरु में गुरुत्व होना चाहिए।
समाज और राष्ट्र के निर्माण में गुरु और शिष्य की महती भूमिका है, इसलिए
उन्हें अपने दायित्व का निर्वहन सम्यक् रूप से करना चाहिए। गुरु शिष्य के
आत्मा का संस्कार करता है। शिष्य के व्यक्तित्व के विकास में गुरु की
महत्वपूर्ण भूमिका होती है। डॉ. द्विवेदी ने कहा कि यह दिवस जीवन के लिए
महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गुरुओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का
है। धर्म को जानने वाले, धर्मानुकूल आचरण करने वाले, धर्मपरायण और सब
शास्त्रों में से तत्त्वों का आदेश करने वाले को गुरु कहा जाता है। जैसे
सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति
मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति
और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है।
कार्यक्रम के
विशिष्ट अतिथि मारवाड़ी महाविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्राध्यापक डॉ.
राहुल कुमार ने कहा कि हमें जीवनपर्यन्त अध्ययनशील रहना चाहिए। भारतीय
परम्परा में गुरु का स्थान सर्वोपरि है। जीवन में अज्ञान का अन्धकार दूर
करने वाले सभी गुरु पद के अधिकारी हैं।
विभागीय शिक्षक डॉ. जगदम्बा
प्रसाद ने कहा कि माता-पिता सर्वोच्च गुरु होते हैं। शास्त्रज्ञान और
व्यवहार ज्ञान देने वाले भी गुरु ही होते हैं। महर्षि वेदव्यास ने भारतीय
संस्कृति और धर्म को सहेजने में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
विभागीय शिक्षिका डॉ. श्रीमित्रा ने कहा कि आज के युग में भी गुरु का महत्व
कम नहीं हुआ है। यद्यपि शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन आया है और शिक्षा
प्राप्त करने के माध्यम भी बदले हैं, परंतु गुरु का स्थान अभी भी अनिवार्य
है।
शिक्षा, ज्ञान और नैतिकता के महत्व को भी समझाता है गुरु पूर्णिमा का पर्व : शैलेश मिश्र

