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जयंती विशेष: लाहौर बमकांड के अभियुक्‍त थे भाई हिरदा राम, कालापानी में काटी थी उम्रकैद की सजा



मंडी। मंडी के पहले गदरिये हरदेव उर्फ स्वामी कृष्णानंद के संपर्क में आए भाई हिरदा राम बम बनाने में माहिर थे। अपने इसी हुनर की वजह से भाई हिरदा राम बम मास्टर के नाम से मशहूर थे। उनके द्वारा बनाए गए बमों के धमाकों की गूंज से ब्रिटश हुकूमत चूलें हिल गई थी। भाई हिरदा राम अपना घरबार और नाबालिग विवाहिता पत्नी को छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। 28 नवंब, सन् 1885 को मंडी रियासत की राजधानी मंडी नगर में गज्जन सिंह के घर पैदा हुए थे।


 भाई हिरदा राम मंडी नगर के ही युवा गदर पार्टी के सदस्य हरदेव से प्रेरित होकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। क्रांति से संबंधी साहित्य पढ़‌ने पर इनके मन में देश प्रेम का जोश उमड़ने लगा। उन दिनों बंगाल के प्रसिद्ध क्रांतिकारी रास बिहारी लाल बोस पंजाब के क्रातिकारियों के बुलावे पर जनवरी 1915 में अमृतसर आए थे।


मंडी रियासत की रानी खैरगढ़ी ने भाई हिरदा राम को बम बनाने के प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए रास बिहारी बोस के पास भेजा। रास बिहारी बोस ने वायसराय पर बम फेंका था तथा वे दिल्ली और लाहौर बम षड्यंत्र के भी अभियुक्त थे। बम बनाने के लिए जंगलों को चुना जाता था। पूरे देश में अंग्रेजों से टक्कर लेने के लिए पर्याप्त धन चाहिए था अतः क्रातिकारी सरकारी खज़ाने में लूटपाट भी करने लगे।


बम बनाने का काम कठिन तथा जोखिम भरा था। इस कार्य के लिए परमानंद, डॉ. मथरा सिंह और भाई हिरदा राम चुने गए। भाई हिरदा राम बिहारी बोस के विश्वासपात्र तथा निकटतम साथी बन गए। गदर पार्टी ने 21 फरवरी, 1915 को गदर का दिन निश्चित किया परंतु बाद में यह तारीख बदल कर 19 फरवरी कर दी गई। लेकिन क्रातिकारियों के एक साथी कृपाल सिंह ने इस तिथि की सूचना पुलिस को दे दी थी जिसकी वजह से तिथि में परिवर्तन किया गया।


 क्रान्तिकारियों को सांकेतिक भाषा में तार भेजे गए परंतु सरकार को उनकी गतिविधियों का पता चल गया। अतः भाई हिरदा राम तथा साथियों को गिरफ्तार करके लाहौर सैंट्रल जेल भेज दिया गया। हिरदा राम बमों के साथ पकड़ा गया था। 26 फरवरी को हिरदा राम की पुस्तकें तथा कपड़े एक मकान पर छापा मारने के बाद पुलिस के हाथ लगे। लाहौर सैंट्रल जेल में क्रातिकारियों के विरूद्ध 26 अप्रैल, 1915 को मुकद्दमा चला।


 मुकद्दमें की सुनवाई तीन विशेष न्यायाधीशों का दल कर रहा था। इस दल में दो न्यायाधीश अंग्रेज थे। इनके नाम ए.ए. इरविन तथा टी.पी. ऐलिस थे। सरकारी वकील के रूप में पैरवी के लिए इंग्लैंड के प्रसिद्ध बैरिस्टर सी. वेवन पिटमैन को बुलाया गया था। भाई हिरदा राम की पैरवी करने वाला कोई नहीं था।


लाहौर बम कांड में 81 अपराधियों पर सरकार बनाम आंनद किशोर तथा अन्यों पर मुकद्दमा चलाया गया। इसमें भाई हिरदा राम अभियुक्त नंबर 27 पर फैसला दिया गया। जिसमें हिरदा राम पुत्र गज्जन सिंह राजपूत मंडी रियासत को भारतीय दंड संहिता के अंडर सैक्शन 121, 121ए, 122, 131, 397,398-109 और 302-109 के तहत फांसी पर लटकाने की सजा सुनाई गई। हिरदा राम की नाबालिग पत्नी सरला देवी की अपील पर वायसराय हार्डिंग ने भाई हिरदा राम की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में तबदील कर दिया। 


उन्हें पंजाब के क्रांतिकारियों के साथ कालापानी अंडेमान की सेलुलर जेल की कोठरी में बेड़ियों से जकड़ कर रखा गया। सेलुलर जेल के फांसीघर के ठीक पीछे तीसरी मंजिल पर स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर की कोठरी थी। उसी मंजिल पर भाई हिरदा राम की कोठरी भी थी। जहां पर भाई हिरदा राम का वीर सावरकर से परिचय हुआ था, वीर सावरकर को कोड़े मारने का विरोध करने पर हिरदा राम को सजा के तौर पर चालीस दिन तक लोहे के पिंजरे में रखा गया।


 इसके बाद भाई हिरदा राम ने अपनी आजीवन कारावास की सजा मद्रास जेल में काटी। सन् 1929 ई. को सजा पूरी होने पर वे मंडी नगर लौट आए थे। इनके दो बेटे विक्रमजीत सिंह और रणजीत सिंह तथा एक बेटी सावित्री देवी हुई। भाई हिरदा राम अपने अंतिम समय में अपने बेटे रणजीत सिंह के साथ शिमला में रहते थे, जहां 21 अगस्त 1965 को उनका निधन हो गया। हर वर्ष भाई हिरदा राम स्मारक कार्य समिति की ओर से 28 नवंबर को इंदिरा मार्किट की छत पर स्थित उनकी प्रतिमा के पास उनको श्रद्धांजलि अर्पित कर उन्हें याद किया जाता है।