आगरा: राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सम्मिलित
क्षेत्र से बना करीब 435 किलोमीटर लम्बाई में फैला चंबल क्षेत्र की 60-70
के दशक में डकैतों, दस्युओं और बागियों के पनाहगार क्षेत्र के रूप में
इसकी पहचान थी। लेकिन आज इस क्षेत्र की प्राणदायिनी चंबल नदी अपने साफ पानी
और प्राकृतिक विशेषताओं की वजह से संकटग्रस्त विलुप्त होने की कगार पर
पहुंचे जलीय जीव घड़ियाल, बटागुर कछुएं, डॉल्फिनों और इंडियन स्कीमरों के
लिए जीवन दाहिनी और पोषक बन चुकी है। चंबल नदी के संरक्षण में पिछले 10
वर्षों में चंबल सैंक्चुरी में मगरमच्छ की संख्या बढ़कर दोगुनी से अधिक
हुई है।चंबल में घड़ियाल और डॉल्फिन की संख्या में भी इजाफा हो रहा है।
1979 में बना राष्ट्रीय राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य
ऐतिहासिक,
सांस्कृतिक और पारिस्थितिकी तंत्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण चंबल क्षेत्र
में केंद्र सरकार ने 1979 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में
चंबल नदी के आसपास स्थित क्षेत्रों को सम्मिलित कर राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य
बनाया गया। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य की लंबाई करीब 440 किलोमीटर है
जिसमें मध्य प्रदेश के भिंड, मुरैना, राजस्थान के धौलपुर और उत्तर प्रदेश
के आगरा, इटावा और औरैया जनपदों के कुछ क्षेत्र सम्मिलित हैं।
राष्ट्रीय
चंबल अभयारण्य जलीय जीवों के निवास स्थान के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण पक्षी
क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के विकास के
लिए तीनों राज्यों ने अपने-अपने स्तर से जलीय जीवों के संरक्षण के लिए
पुरजोर तैयारी भी की हैं। सन 1981 में घड़ियाल संरक्षण परियोजना बनी। इसके
बाद चंबल में घड़ियाल संरक्षण पर काम शुरू किया गया। इन सम्मिलित प्रयासों
से चंबल नदी में घड़ियाल, मगरमच्छ, बटागुर कछुआ और डाॅल्फिन का कुनबा तेजी
से बढ़ रहा है।
सरकार की इंटीग्रेटिड डब्लपमेंट आफ वाइल्डलाइफ हेविटाट योजना
चंबल
सैंक्चुरी प्रोजेक्ट के डीएफओ ने बताया कि चंबल में संकटग्रस्त जलीय जीव
के संरक्षण को लेकर सरकार की योजना है. सरकार की इंटीग्रेटिड डब्लपमेंट आफ
वाइल्डलाइफ हेविटाट योजना में हम बहुत कार्य करते हैं, जिससे चंबल में
घड़ियाल, मगरमच्छ, बटागुर कछुआ और डाॅल्फिन का संरक्षण किया जा रहा
है।मार्च और अप्रैल में घड़ियाल, मगरमच्छ और बटागुर कछुआ के प्रजनन का समय
आता है तो इनके अंडे की देखरेख कर्मचारी करते हैं।इसकी लगातार मॉनीटरिंग
होती है। एनजीओ के साथ मिलकर रेस्क्यू, रिहेबिलेटशन, हेचिंग और बच्चों को
यमुना में रिलीज किया जाता है. इस तरह से संरक्षण किया जा रहा है।
जन जागरूकता प्रयास
चंबल
सैंक्चुरी क्षेत्र में वन्यजीव और मानव के बीच विरोधाभाष और आपसी संघर्ष
की स्थति रोकने के लिए चंबल नदी के किनारे बसे गांवो के लोगों को समय-समय
पर वन्यजीवों के संबंध में विशेषज्ञों द्वारा जानकारी देकर और उन्हें
जागरूक किया जाता है। बाढ़ के दौरान वन्यजीवों के गांव में घुसने पर की
जाने वाली कार्रवाई को भी ग्रामीणों को बताया जाता है।
इको टूरिज्म के लिए एकदम उपयुक्त है चंबल क्षेत्र
यूपी
सरकार का ईको टूरिज्म पर जोर हैं, आगरा की बात करें तो चंबल नदी में
बोटिंग की व्यवस्था है। यहां पर आने वाले पर्यटक चंबल में संकटग्रस्त जलीय
जीव जैसे घड़ियाल, मगरमच्छ, बटागुर कछुआ और डाॅल्फिन के साथ ही बेहद ही
खूबसूरत रंग बिरंगे पक्षी देख सकते हैं। इस समय चल रही शीत ऋतु में हजारों
किलोमीटर की उड़ान भर सुदूर क्षेत्रों से चंबल पहुंचे प्रवासी पक्षियों के
कलरव पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। चंबल सेंचुरी टूरिज्म
के लिए बने मैनेंजमेंट प्लान में पिनाहट और नंदगवा चयनित केंद्र हैं जहां
पर्यटक पहुंचकर इस क्षेत्र में भ्रमण के लिए सुविधा प्राप्त कर सकते हैं।
चंबल का शुद्ध पानी वन्यजीवों और प्रवासी पक्षियों के लिए सर्वोत्तम
आगरा
के पर्यावरणविद और पक्षी विशेषज्ञ डॉ. केपी सिंह ने बताया कि चंबल नदी में
औद्योगिक कचरा या अन्य तरह का प्रदूषण काम है जिससे यहां का जल शुद्ध और
निर्मल है इसलिए, हर साल चंबल में देश और दुनियां से पक्षी पहुंचते हैं।
इसमें इंडियन स्कीमर पक्षी शामिल है जो संकटग्रस्त पक्षी हैं, जो बेहद
सुंदर है. इंडियन स्कीमर इस मौसम में आता ही नहीं बल्कि यहां पर ब्रीड भी
करता है. इसके साथ ही प्रवासी पक्षी यहां पर खूब कलरव करते हैं।
चंबल में दुनिया के 80 फीसद घड़ियालों का बसेरा है
चंबल सफारी के निदेशक आरपी सिंह ने बताया कि चंबल नंदी में घड़ियाल
संरक्षण परियोजना की शुरुआत 1981 में शुरू की गई थी जिसमें राजस्थान, मप्र
और उप्र के राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के अधिकारियों द्वारा घड़ियाल संरक्षण
परियोजना पर संयुक्त रूप से काम किया गया जिसकी वजह से ही चंबल नदी में
लगातार घड़ियालों के साथ साथ मगरमच्छ का कुनबा भी हर साल बढ़ रहा है।यदि हम
बीते दस साल के आंकड़ों की बात करें तो राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में
मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के संयुक्त सर्वे में करीब ढाई गुना
घड़ियाल बढ़े हैं। वर्ष 2025 में इनकी संख्या 2176 से बढ़कर 2456 हो गई है
जो दुनिया के घड़ियालों की 80 प्रतिशत है।
चम्बल में कछुओं और इंडियन स्कीमर का भी संरक्षण
फॉरेस्ट
रेंजर कुलदीप साहब पंकज ने बताया कि कछुओं की आठ प्रजातियां चंबल में
मौजूद हैं जिनकी संख्या करीब 15000 है। दुनिया में संकटग्रस्त स्थिति में
पहुंची इंडियन स्कीमर के संरक्षण के लिए 2015 में चंबल को चुना गया था,
लगातार संरक्षण प्रयासों के कारण पिछले साल इनकी संख्या 740 से बढ़कर 843
हो गई है। ये दुनिया में पाए जाने वाले इंडियन स्कीमर का 80 प्रतिशत है।
चंबल नदी में डॉल्फिन की भी अच्छी खासी संख्या है। नदी के साफ और निर्मल
पानी की वजह से इनको जीवन यापन में प्राकृतिक वातावरण मिलता है।