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विशेष रिपोर्ट: सलाखों के पीछे उमड़ी भक्ति.


■ कैदियों के हाथों तैयार 'पुष्प नाग मुकुट' से सजते हैं बाबा बैद्यनाथ.

अमित कुमार 
रांची एक्सप्रेस ब्यूरो

देवघर : झारखंड के प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग में हर शाम होने वाली भव्य श्रृंगार पूजा का दृश्य न केवल अलौकिक होता है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक सुधार और अगाध आस्था की एक ऐसी कहानी छिपी है जो पूरी दुनिया में बेजोड़ है।
बाबा के मस्तक की शोभा बढ़ाने वाला 'पुष्प नाग मुकुट' किसी राजघराने या नामचीन कारीगरों द्वारा नहीं, बल्कि देवघर सेंट्रल जेल के उन कैदियों द्वारा बनाया जाता है जो संगीन अपराधों की सजा काट रहे हैं। यह अनूठी परंपरा पिछले एक सदी से भी अधिक समय से निरंतर जारी है। 


■ परंपरा और निर्माण का पूरा विवरण.

 • मुकुट का प्रकार : फूल, बेलपत्र और औषधीय तत्वों से निर्मित पुष्प 'नाग मुकुट'.

• निर्माण स्थल : देवघर मंडल कारा, झारखंड.

• दैनिक वजन व सामग्री : लगभग 5 किलोग्राम ताजे फूल, गेंदा, बेली और विशेष पत्तियां.

• बनाने वाले : जेल के भीतर करीब 8 से 10 चयनित कैदी.

• विशेष दिन (सावन पूर्णिमा) : इस दिन दो मुकुट बनाया जाता हैं—एक बाबा बैद्यनाथ और दूसरा बाबा बासुकीनाथ के लिए.


■ भोर से शाम तक का दिव्य सफर.

बाबा के इस पवित्र मुकुट को तैयार करने की प्रक्रिया प्रतिदिन सुबह बेहद नियम और निष्ठा के साथ शुरू होती है।

फूलों का संकलन : जेल के सुरक्षाकर्मी और स्थानीय श्रद्धालु सुबह-सुबह ताजे और शुद्ध फूल जुटाकर जेल परिसर में लाते हैं।

कैदियों का उपवास व शुद्धता‌ : मुकुट बनाने वाले कैदी पूरी तरह स्नानादि कर, शुद्ध मन से और कई बार उपवास रखकर दोपहर से इसे बुनने के काम में जुट जाते हैं।

सुरक्षा के बीच यात्रा : शाम को मुकुट तैयार होने के बाद, जेल के सिपाही और पुरोहित इसे सम्मानपूर्वक अपने सिर पर रखकर 'जय शिव' और 'हर हर महादेव' के जयघोष के साथ पैदल मुख्य मार्ग से मंदिर की ओर ले जाते हैं।

पंसारी परिवार की रस्म‌ : मंदिर मार्ग में पड़ने वाले पारंपरिक पंसारी परिवार की दुकान पर इस मुकुट को थोड़ी देर विश्राम दिया जाता है, जहाँ इस पर इत्र, फुलेल और अगरबत्ती अर्पित की जाती है।

शाम का दिव्य श्रृंगार : शाम लगभग 6:10 से 7:30 बजे के बीच होने वाली विशेष श्रृंगार आरती में इसी मुकुट को ज्योतिर्लिंग पर स्थापित किया जाता है।


■ क्या है इसके पीछे का ऐतिहासिक चमत्कार.

लोक मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा ब्रिटिश काल के दौरान शुरू हुई थी। कहा जाता है कि उस समय के एक तत्कालीन अंग्रेज जेलर का पुत्र दक्षिण अफ्रीका में लापता हो गया था। काफी खोजबीन के बाद भी जब वह नहीं मिला, तो स्थानीय लोगों की सलाह पर जेलर ने बाबा बैद्यनाथ से मन्नत मांगी और फूलों से उनका विशेष श्रृंगार करवाया। इसके कुछ ही समय बाद उसका खोया हुआ पुत्र चमत्कारिक रूप से सकुशल वापस लौट आया। इस असीम कृपा से गद्गद होकर जेलर ने संकल्प लिया कि जब तक यह जेल रहेगी, तब तक बाबा का प्रतिदिन का श्रृंगार मुकुट जेल के भीतर से ही बनकर जाएगा।


■ अपराध से अध्यात्म की ओर बढ़ते कदम.

देवघर जेल प्रशासन के अनुसार, इस कार्य से कैदियों के व्यवहार और मानसिकता में अद्भुत सकारात्मक बदलाव (अपराध सुधार) देखने को मिला है। संगीन धाराओं के तहत सजा भुगत रहे कैदी जब बाबा के चरणों के लिए मुकुट बुनते हैं, तो उनकी आँखों से पश्चाताप और भक्ति के आंसू छलक पड़ते हैं। सलाखों के पीछे गूंजने वाला 'महामृत्युंजय मंत्र' और संकीर्तन कैदियों के जीवन को एक नई और पवित्र दिशा दे रहा है।