वर्ष 2026 में प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा मजबूत El Niño मौसम वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। विश्व मौसम संगठन यानी WMO के अनुसार यह घटना आने वाले महीनों में और मजबूत हो सकती है और इसका प्रभाव 2027 की शुरुआत तक वैश्विक तापमान तथा बारिश के पैटर्न पर दिखाई दे सकता है। अमेरिकी NOAA के सितंबर के आकलन में भी El Niño के बहुत मजबूत बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक बताई गई है। El Niño एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। समुद्र के तापमान में यह बदलाव केवल प्रशांत क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करके दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश, तापमान और मौसम के स्वरूप में बदलाव ला सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार हर El Niño का प्रभाव एक जैसा नहीं होता। इसकी तीव्रता, अवधि और दूसरे महासागरीय जलवायु पैटर्न के साथ इसकी परस्पर क्रिया के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों में परिणाम बदल सकते हैं। NOAA के 10 सितंबर के आकलन के मुताबिक पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा ऊपर पहुंच चुका था। अक्टूबर-दिसंबर 2026 के लिए NOAA ने ऐतिहासिक रूप से बेहद मजबूत El Niño बनने की 75 प्रतिशत संभावना बताई है। WMO ने भी सितंबर में कहा कि El Niño मजबूत होने की दिशा में है और फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत है। हालांकि किसी खास देश में मौसम कैसा रहेगा, इसे केवल El Niño के आधार पर निश्चित रूप से नहीं बताया जा सकता। El Niño के मजबूत होने पर एशिया के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश और अधिक गर्मी का जोखिम बढ़ सकता है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ क्षेत्रों में सूखे और पानी की कमी की परिस्थितियां पैदा होने की आशंका जताई गई है। IFRC के एशिया-प्रशांत आकलन में दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिमी प्रशांत के कुछ हिस्सों में कम वर्षा, सूखे और पानी की कमी का खतरा बताया गया है। हालांकि क्षेत्र-दर-क्षेत्र परिस्थितियां अलग हो सकती हैं और कुछ इलाकों में इसके विपरीत अधिक बारिश भी हो सकती है। कम बारिश और ज्यादा गर्मी का सीधा असर वन क्षेत्रों पर पड़ सकता है। सूखी वनस्पति और कम नमी आग के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार कर सकती है। इंडोनेशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में पहले से ही जंगलों में आग और धुएं की समस्या सामने आई है। विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक सूखे मौसम और El Niño से जुड़ी परिस्थितियां इन घटनाओं को बढ़ा सकती हैं। हालांकि यह समझना जरूरी है कि जंगल की आग का कारण केवल El Niño नहीं होता। भूमि उपयोग, मानव गतिविधियां, तापमान और स्थानीय मौसम जैसे दूसरे कारक भी आग की गंभीरता को प्रभावित करते हैं। El Niño का सबसे महत्वपूर्ण असर कृषि पर पड़ सकता है। बारिश में बदलाव और तापमान बढ़ने से बुवाई का समय, फसल की वृद्धि और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इंडोनेशिया में 2026 के दौरान बारिश के मौसम के देर से शुरू होने की संभावना के कारण किसानों को फसल चक्र में बदलाव करने और कम अवधि में तैयार होने वाली फसलों पर विचार करने की सलाह दी गई है। रिपोर्टों के अनुसार चावल, गन्ना, कोको और पाम ऑयल जैसी फसलों पर मौसम संबंधी दबाव पड़ सकता है। अगर प्रमुख कृषि उत्पादक देशों में उत्पादन घटता है, तो उसका असर केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं रहता। चावल, पाम ऑयल, गन्ना और अन्य कृषि वस्तुओं का अंतरराष्ट्रीय कारोबार होने के कारण उत्पादन में कमी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव डाल सकती है। इसी वजह से मौसम वैज्ञानिक और खाद्य नीति विशेषज्ञ El Niño को केवल मौसम की घटना के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे खाद्य सुरक्षा, जल उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा जोखिम भी मानते हैं। भारत में El Niño के प्रभाव को लेकर विशेष ध्यान दिया जाता है, क्योंकि मानसून और कृषि अर्थव्यवस्था के बीच मजबूत संबंध है। WMO के मौसमी आकलन में सितंबर-नवंबर 2026 के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से में सामान्य से अधिक तापमान की संभावना बताई गई थी और कुछ क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा का जोखिम भी दर्शाया गया था। लेकिन भारत के किसी एक राज्य या पूरे देश में बारिश की स्थिति को केवल El Niño से तय नहीं किया जा सकता। Indian Ocean Dipole (IOD) समेत कई अन्य जलवायु प्रणालियां भी भारतीय मौसम को प्रभावित करती हैं। इस समय सकारात्मक IOD के विकसित होने का भी अनुमान है, जो कुछ क्षेत्रों में El Niño के सामान्य प्रभाव को बदल या कमजोर कर सकता है। अगर किसी क्षेत्र में लंबे समय तक बारिश कम होती है, तो जलाशयों, नदियों और भूजल पर दबाव बढ़ सकता है। ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी के साथ सिंचाई की समस्या भी सामने आ सकती है। दूसरी तरफ अत्यधिक गर्मी का असर स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। खासकर बुजुर्गों, बच्चों, खुले में काम करने वाले श्रमिकों और पहले से संवेदनशील लोगों के लिए लंबे समय तक गर्म मौसम चुनौती बन सकता है। ऐसा जरूरी नहीं है। El Niño का प्रभाव क्षेत्र के अनुसार अलग होता है। जहां कुछ हिस्सों में सूखे और गर्मी का खतरा बढ़ सकता है, वहीं दूसरे क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश और बाढ़ की परिस्थितियां भी बन सकती हैं। WMO ने स्पष्ट किया है कि El Niño के प्रभाव को लेकर पूर्वानुमान संभावनाओं पर आधारित होते हैं, निश्चित भविष्यवाणी नहीं। स्थानीय मौसम प्रणालियां और अन्य महासागरीय परिस्थितियां अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं। वैज्ञानिक संस्थाएं इस समय केवल संभावित खतरे की जानकारी देने पर नहीं, बल्कि पहले से तैयारी करने पर भी जोर दे रही हैं। WMO ने सरकारों और जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों को शुरुआती चेतावनी प्रणालियों, मौसम संबंधी जानकारी और जोखिम प्रबंधन को मजबूत करने की सलाह दी है। कृषि क्षेत्र में मौसम आधारित सलाह, पानी का बेहतर प्रबंधन, फसल योजना में बदलाव और आग की रोकथाम जैसी तैयारियां संभावित नुकसान को कम करने में मदद कर सकती हैं। 2026 का मजबूत होता El Niño वैश्विक मौसम व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण जलवायु घटनाओं में से एक बन गया है। इसके कारण एशिया के कई हिस्सों में गर्मी, कम बारिश, सूखे और जंगलों में आग का जोखिम बढ़ सकता है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में भारी बारिश की स्थिति भी बन सकती है। कृषि उत्पादन और खाद्य आपूर्ति पर संभावित असर को देखते हुए वैज्ञानिक संस्थाएं समय रहते तैयारी और स्थानीय स्तर पर जोखिम प्रबंधन को महत्वपूर्ण मान रही हैं।आखिर El Niño क्या है?
इस बार क्यों बढ़ी चिंता?
एशिया पर पड़ सकता है बड़ा असर
जंगलों में आग का खतरा बढ़ सकता है
कृषि क्षेत्र के लिए चुनौती
खाद्य कीमतों पर भी असर की संभावना
भारत के लिए इसका क्या मतलब?
पानी और स्वास्थ्य पर भी दबाव
क्या El Niño हर जगह सूखा लाएगा?
वैज्ञानिकों का जोर तैयारी पर
निष्कर्ष
2026 में मजबूत El Niño से बढ़ी चिंता, एशिया में सूखा और गर्मी के साथ खाद्य सुरक्षा पर भी असर की आशंका





