वॉशिंगटन। अमेरिका और चीन के शीर्ष नेतृत्व की हालिया मुलाकात में वैश्विक व्यापार और द्विपक्षीय संबंधों के साथ मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष भी महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में सामने आया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बातचीत में ईरान के साथ चल रहे युद्ध, क्षेत्रीय तनाव और उससे जुड़ी ऊर्जा आपूर्ति की स्थिति पर चर्चा हुई। इस बातचीत का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले ऊर्जा परिवहन पर संघर्ष का असर पड़ा है। चीन मध्य-पूर्व से आने वाले तेल पर काफी निर्भर है, इसलिए क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता रहने से उसकी ऊर्जा लागत और आपूर्ति व्यवस्था पर भी दबाव पड़ सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पुष्टि की कि उन्होंने शी जिनपिंग के साथ ईरान युद्ध पर बातचीत की। अमेरिकी राजदूत डेविड पर्ड्यू के अनुसार, वॉशिंगटन ने बीजिंग को यह संदेश भी दिया कि ईरान को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सैन्य, खुफिया अथवा अन्य प्रकार की सहायता देना अमेरिका के लिए स्वीकार्य नहीं होगा। अमेरिकी पक्ष की यह चिंता ऐसे समय में सामने आई है जब वॉशिंगटन ईरान पर आर्थिक और सैन्य दबाव बनाए हुए है। अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान के साथ ऐसा सहयोग न करे जिससे तेहरान की सैन्य या रणनीतिक क्षमता मजबूत हो। हालांकि, चीन की ओर से इस विषय पर अलग दृष्टिकोण सामने आया है। चीनी सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, शी जिनपिंग ने अमेरिका और ईरान से बातचीत की प्रक्रिया दोबारा शुरू करने तथा जून में बने ढांचे की ओर लौटने का आग्रह किया। चीन ने संघर्ष को कूटनीतिक तरीके से कम करने और वार्ता के जरिए समाधान तलाशने की बात कही है। इससे यह संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन और बीजिंग ईरान संकट को लेकर एक ही नीति नहीं रखते। अमेरिका का जोर ईरान पर दबाव और चीन की भूमिका को सीमित करने पर है, जबकि चीन ने बातचीत और तनाव कम करने की दिशा पर जोर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर और आगे हिंद महासागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। मध्य-पूर्व के तेल और गैस परिवहन के लिए इसकी रणनीतिक भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। क्षेत्रीय संघर्ष के कारण यहां टैंकरों और अन्य वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। 25 सितंबर की रिपोर्टों में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार करता दिखाई दिया था। होर्मुज संकट का चीन पर विशेष प्रभाव पड़ सकता है। चीन मध्य-पूर्व से बड़ी मात्रा में ऊर्जा आयात करता है और समुद्री मार्गों में व्यवधान आने पर उसे लंबी दूरी के वैकल्पिक स्रोतों तथा अधिक महंगे परिवहन का सहारा लेना पड़ सकता है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, मध्य-पूर्व से तेल आपूर्ति बाधित होने के बीच चीन में तेल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ा है। यही कारण है कि बीजिंग के लिए युद्ध को लंबा खिंचने से रोकना केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा विषय है। ट्रंप-शी बातचीत के समानांतर ईरान ने अमेरिका के सामने होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य समुद्री आवाजाही बहाल करने के लिए सात दिन के प्रस्ताव की बात रखी है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने इसे व्यापक समझौते से जोड़ते हुए युद्धविराम, अमेरिकी प्रतिबंधों में राहत और परमाणु वार्ता दोबारा शुरू करने जैसी शर्तों का उल्लेख किया है। अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थों के जरिए बातचीत भी चल रही है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सात दिन की योजना ईरान का प्रस्ताव है, कोई अंतिम अंतरराष्ट्रीय समझौता नहीं। ईरान के अलावा दोनों देशों के बीच कई अन्य रणनीतिक मुद्दे भी मौजूद हैं। ऐसे में मध्य-पूर्व युद्ध बातचीत में एक अतिरिक्त जटिलता लेकर आया है। अमेरिका चीन पर ईरान को संभावित सहायता देने को लेकर सवाल उठा रहा है, जबकि चीन संघर्ष को बातचीत के जरिए सुलझाने की वकालत कर रहा है। दोनों पक्षों के सार्वजनिक बयानों में अंतर दिखाई देता है, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि ऊर्जा आपूर्ति में लंबे समय तक व्यवधान दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए चिंता का विषय बन सकता है। होर्मुज में जहाजों की आवाजाही और मध्य-पूर्व के तेल उत्पादन से जुड़ी खबरों का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है। संघर्ष बढ़ने की आशंका से बाजार में जोखिम बढ़ता है, जबकि युद्धविराम या समुद्री मार्ग खुलने की उम्मीद से कीमतों पर दबाव कुछ कम हो सकता है। 25 सितंबर को वैश्विक तेल कीमतों में फिर तेजी देखी गई थी, क्योंकि युद्ध को समाप्त करने की दिशा में तत्काल ठोस प्रगति के संकेत सीमित रहे। इसका प्रभाव आगे चलकर पेट्रोलियम उत्पादों, परिवहन लागत और उन देशों की महंगाई पर भी पड़ सकता है जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं। भारत सहित एशिया की कई अर्थव्यवस्थाएं मध्य-पूर्व से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर हैं। इसलिए होर्मुज में स्थिरता लौटना एशियाई ऊर्जा बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण होगा। यदि समुद्री मार्गों पर जोखिम लंबे समय तक बना रहता है तो जहाजों के बीमा खर्च, माल ढुलाई और वैकल्पिक मार्गों की लागत बढ़ सकती है। इसके विपरीत, सुरक्षित और नियमित समुद्री आवाजाही बहाल होने पर आपूर्ति से जुड़ी अनिश्चितता कम हो सकती है। हालांकि, किसी भी देश पर वास्तविक प्रभाव उसकी आयात व्यवस्था, वैकल्पिक स्रोतों और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों पर निर्भर करेगा। फिलहाल तीन घटनाक्रमों पर विशेष नजर बनी हुई है—अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत, होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात की स्थिति और चीन की कूटनीतिक भूमिका। यदि अमेरिका और ईरान के बीच किसी समझौते की दिशा में प्रगति होती है, तो होर्मुज में आवाजाही सामान्य होने की संभावना बढ़ सकती है। दूसरी ओर, संघर्ष बढ़ने पर ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक बाजारों पर दबाव और बढ़ सकता है। चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी, क्योंकि बीजिंग के आर्थिक हित सीधे मध्य-पूर्व से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े हैं। ट्रंप और शी जिनपिंग की बातचीत में मध्य-पूर्व युद्ध, ईरान और ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा ऐसे समय उठा है जब होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता बनी हुई है। अमेरिका चीन से ईरान को किसी तरह की सैन्य या खुफिया सहायता न देने पर जोर दे रहा है, जबकि चीन ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत तथा तनाव कम करने की अपील की है। होर्मुज की स्थिति का असर केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक तेल आपूर्ति, समुद्री परिवहन, ऊर्जा लागत और आयात पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्थाओं से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान वार्ता और होर्मुज की स्थिति पर दुनिया के ऊर्जा बाजारों की नजर बनी रहेगी।ट्रंप ने शी से ईरान का मुद्दा उठाया
शी जिनपिंग ने बातचीत और तनाव कम करने पर जोर दिया
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों बना बड़ा मुद्दा?
चीन के लिए ऊर्जा सुरक्षा बड़ी चिंता
ईरान ने भी रखा सात दिन का प्रस्ताव
अमेरिका-चीन संबंधों में एक और संवेदनशील मुद्दा
तेल बाजार पर नजर
भारत के लिए भी अहम घटनाक्रम
अब आगे क्या होगा?
निष्कर्ष
ट्रंप-शी मुलाकात में ईरान युद्ध और होर्मुज संकट पर चर्चा, ऊर्जा आपूर्ति बनी अहम चिंता





