अब इसे छात्रों के आंदोलन से ध्यान भटकाने की कोशिश कहें, या कुछ और, लेकिन पिछले दो दिनों से झारखंड का सत्ताधारी दल केंद्र सरकार द्वारा पारित खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 को लेकर रोज नई कहानियां सुना रहा है।
पहली बात, इस संशोधन के लागू होने के बाद भी राज्य सरकार को मिल रही रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, DMFT फंड, राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट आदि से होने वाली हजारों करोड़ रुपए की आय में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।
फर्क (यदि पड़ता है तो) सिर्फ अतिरिक्त रूप से लगाए जाने वाले सेस पर पड़ सकता है, लेकिन वह राशि 2024-25 में मात्र 1,380 करोड़ एवं 2025-26 में 7,486 करोड़ रही। लेकिन यह फर्क भी पड़ेगा या नहीं, वह भविष्य कानून लागू होने के बाद केंद्र सरकार के गाइडलाइंस जारी करने पर तय होगा। उन निर्देशों का पालन कर के, ऐसे सेस जारी भी रह सकते हैं।
सेस का मतलब टैक्स पर लगाया जाने वाला अतिरिक्त टैक्स होता है और जीएसटी लागू होते समय भी ऐसे कई प्रकार के सेस हटाए गए थे। "वन इंडिया, वन टैक्स" के इस दौर में केन्द्र सरकार पूरे देश में टैक्स स्ट्रक्चर का सरलीकरण कर रही है, और यह कानून सिर्फ झारखंड नहीं, बल्कि सारे देश में लागू होगा।
केन्द्र में एनडीए सरकार (2014) आने के बाद राज्यों की माइनिंग से होने वाली आय में 354% की वृद्धि हुई है। इस दौरान राज्यों को 7 लाख करोड़ से अधिक प्राप्त हुए हैं। वर्तमान में, राज्यों को खनन क्षेत्र से प्राप्त कुल राजस्व का करीब 90% हिस्सा मिलता है, और इस संशोधन बिल के बाद भी 90% मिलता रहेगा।
वैसे भी, जब सुप्रीम कोर्ट ने यह सेस लगाने का प्रस्ताव दिया था, तब उनकी मंशा शायद इस राशि द्वारा खनन प्रभावित क्षेत्रों एवं विस्थापितों के विकास की रही होगी, लेकिन झारखंड में ऐसा नहीं हुआ। यहाँ प्रदूषण एवं विस्थापन की मार झेल रहे हजारों-लाखों परिवार आज भी उसी परिस्थिति में जीने के लिए मजबूर हैं, जबकि इस रकम से हर साल सैकड़ों गांवों को "स्मार्ट विलेज" में बदल पर, उनका कायाकल्प किया जा सकता था। लेकिन यहाँ सरकार का ध्यान समस्या के स्थायी समाधान एवं विस्थापितों के जीवन स्तर में सकारात्मक बदलाव की जगह वोट बैंक की राजनीति पर केंद्रित रहा।
ये लोग कहते हैं कि इससे अबुआ आवास एवं मईया सम्मान जैसी योजनाओं पर असर पड़ेगा, लेकिन अबुआ आवास योजना नवंबर 2023 में शुरू हुई थी, जबकि मईया सम्मान योजना की घोषणा मेरे कार्यकाल में (जून 2024) में हुई थी। उस वक्त सेस की राशि मिलने की कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं थी, फिर आप इन योजनाओं को इस राशि से क्यों जोड़ रहे हैं?
वैसे भी, अगर इस सरकार के कार्यकाल के बजट एवं खर्चों को देखा जाए, तो हर साल इनके पास 25-30 हजार करोड़ रुपए ऐसे बच जाते हैं, जिन्हें राज्य सरकार खर्च ही नहीं कर पाती, तो उस राशि का उपयोग इन योजनाओं के लिए किया जा सकता है। यह आंकड़ा वित्त वर्ष 2024-25 में ₹31,110 करोड़, 2023-24 में ₹32,744 करोड़, 2022-23 में ₹24,623 करोड़ रहा।
खनन से जुड़े राजस्व के मुद्दे पर राज्य सरकार की गंभीरता को इसी बात से समझा जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में CAG ने झारखंड में अवैध खनन की वजह से हजारों करोड़ के नुकसान की बात कही, कई पहाड़ों को अवैध रूप से गायब कर दिया गया, DMFT में घोटाला हुआ, ईडी ने हजारों करोड़ के अवैध खनन मामले में सीएम के करीबियों पर चार्जशीट फाइल की है, लेकिन इन्हें इन सब से रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा।
खुद को अबुआ सरकार बताने वाली यह जन-विरोधी सरकार नगड़ी में, बिना भूमि अधिग्रहण के, गरीब आदिवासी/ मूलवासी किसानों की जमीन पर जबरन कब्जा कर रही है। राज्य में शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं नदारद हैं, ब्लॉक से लेकर जिला स्तर तक व्याप्त भ्रष्ट्राचार से जनता परेशान है और सरकारी नौकरियों की खुलेआम खरीद-बिक्री ने सरकार के मुंह पर से शराफत का नकाब उतार फेंका है। इस तानाशाही सरकार के खिलाफ नगड़ी के किसान भी जल्दी ही सड़कों पर उतरेंगे।
पिछले तीन हफ्तों से, रांची की सड़कों पर लाखों युवा इस सरकार के खिलाफ खड़े हैं, सोशल मीडिया पर इनके नेताओं के हर पोस्ट पर निगेटिव कमेंट्स की भरमार है। युवाओं, छात्रों एवं आम जनता का भरोसा खो चुकी यह सरकार सिर्फ मुद्दा भटकाने के लिए खनन संशोधन विधेयक के खिलाफ अनर्गल प्रलाप कर रही है।
सरकारी संसाधनों की सुनियोजित लूट, भ्रष्टाचार और तानाशाही से त्रस्त झारखंड के युवा, छात्र, किसान तथा आदिवासी- मूलवासी अब इस सरकार के चाल, चेहरा और चरित्र को भली-भांति पहचान चुके हैं। लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है और आने वाले समय में प्रदेश की जनता इस सरकार के खिलाफ एकजुट होकर सड़कों पर उतरेगी।







