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IIT-ISM धनबाद को बांध निर्माण की नई तकनीक का पेटेंट, मिट्टी के साथ फ्लाई ऐश और चूने का होगा इस्तेमाल


धनबाद। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT-ISM) धनबाद के सिविल इंजीनियरिंग विभाग ने बांध निर्माण के क्षेत्र में एक नई तकनीक विकसित की है। संस्थान की शोध टीम को अर्थन डैम के निर्माण से जुड़ी इस तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट प्रदान किया गया है। नई व्यवस्था में प्राकृतिक मिट्टी की खपत कम करने के साथ थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली फ्लाई ऐश का उपयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

क्या है नई तकनीक?

इस तकनीक का नाम “Earth Dam Structure with Compacted Clay-Fly Ash-Lime Core” बताया गया है। इसमें बांध के मुख्य कोर हिस्से में केवल पारंपरिक मिट्टी पर निर्भर रहने के बजाय मिट्टी, फ्लाई ऐश और चूने से तैयार मिश्रित सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस मिश्रण का उद्देश्य बांध के भीतर पानी के रिसाव को नियंत्रित करने के साथ संरचना की मजबूती और स्थिरता बढ़ाना है। चूने को मिश्रण को स्थिर करने में मददगार घटक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।

फ्लाई ऐश का होगा उपयोग

इस शोध की एक खास बात यह है कि इसमें फ्लाई ऐश जैसे औद्योगिक अवशेष को निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल करने की संभावना पर काम किया गया है। देश के ताप विद्युत संयंत्रों से बड़ी मात्रा में फ्लाई ऐश निकलती है, इसलिए इसका उपयोग बढ़ाना कचरा प्रबंधन और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

नई तकनीक के जरिए बांध निर्माण में आवश्यक प्राकृतिक मिट्टी की मात्रा घटाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे उन इलाकों में मदद मिल सकती है जहां उपयुक्त मिट्टी सीमित मात्रा में उपलब्ध है, जबकि फ्लाई ऐश आसानी से मिल सकती है।

शोध छह महीने में पूरा

संस्थान से मिली जानकारी के मुताबिक यह शोध किसी बाहरी वित्तीय सहायता के बिना IIT-ISM के अपने संसाधनों से किया गया। शोध कार्य मई 2025 में पीएचडी कार्यक्रम के तहत शुरू हुआ और करीब छह महीने की अवधि में इसे पूरा किया गया।

इस तकनीक को भारतीय पेटेंट कार्यालय से पेटेंट संख्या 601531 प्रदान की गई है। पेटेंट की वैधता आवेदन की तारीख से 20 वर्ष बताई गई है।

चार शोधकर्ताओं का योगदान

इस तकनीक के विकास में IIT-ISM से जुड़े चार शोधकर्ताओं की भूमिका रही। इनमें सुबोध श्रीवास्तव, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विश्वनाथ एन. खत्री, पूर्व शोध छात्र और BIT Mesra के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशेष बनर्जी तथा पूर्व विभागाध्यक्ष दिवंगत डॉ. श्रीनिवास पसुपुलेटी शामिल हैं।

शोध टीम ने इस उपलब्धि को सामूहिक प्रयास का परिणाम बताया है। टीम ने दिवंगत डॉ. श्रीनिवास पसुपुलेटी के शोध योगदान को भी याद किया।

बांध निर्माण में क्यों महत्वपूर्ण है यह तकनीक?

अर्थन डैम यानी मिट्टी से बने बांधों में कोर हिस्सा पानी के रिसाव को नियंत्रित करने के लिहाज से महत्वपूर्ण होता है। इस हिस्से में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की मजबूती और जलरोधक क्षमता बांध की दीर्घकालिक स्थिरता से जुड़ी होती है।

IIT-ISM की विकसित तकनीक में प्राकृतिक मिट्टी के साथ फ्लाई ऐश और चूने का संयोजन किया गया है। हालांकि बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पहले इसकी वास्तविक परिस्थितियों में क्षमता और लंबे समय तक प्रदर्शन का मूल्यांकन करना जरूरी होगा।

आगे फील्ड टेस्ट पर रहेगा जोर

पेटेंट मिलने के बाद शोध का अगला चरण तकनीक की व्यावहारिक उपयोगिता का विस्तृत परीक्षण करना है। शोधकर्ता अलग-अलग अनुपात में मिट्टी, फ्लाई ऐश और चूने के मिश्रण का अध्ययन करेंगे।

इस दौरान सामग्री की वहन क्षमता, मजबूती, पानी के रिसाव पर नियंत्रण और लंबे समय तक व्यवहार जैसे पहलुओं का परीक्षण किया जाएगा। इसके आर्थिक प्रभाव का आकलन भी किया जाएगा, ताकि यह पता लगाया जा सके कि वास्तविक परियोजनाओं में तकनीक कितनी उपयोगी और व्यवहारिक साबित हो सकती है।

किन क्षेत्रों में हो सकता है इस्तेमाल?

ऐसे इलाकों में इस तकनीक की उपयोगिता पर विचार किया जा सकता है जहां बांध निर्माण के लिए पर्याप्त मात्रा में उपयुक्त प्राकृतिक मिट्टी उपलब्ध नहीं है, लेकिन फ्लाई ऐश की आपूर्ति आसपास के ताप विद्युत संयंत्रों से हो सकती है।

हालांकि, किसी भी बड़े बांध में तकनीक अपनाने से पहले स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों, निर्माण मानकों, लागत, पर्यावरणीय प्रभाव और लंबे समय की सुरक्षा का वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक होगा।

IIT-ISM के लिए एक और शोध उपलब्धि

IIT-ISM धनबाद लंबे समय से खनन, भू-तकनीकी इंजीनियरिंग और औद्योगिक अपशिष्ट के उपयोग जैसे क्षेत्रों में शोध कर रहा है। संस्थान के CIIE के पेटेंट रिकॉर्ड में भी कई तकनीकों के पेटेंट दर्ज हैं।

नई बांध निर्माण तकनीक इसी दिशा में एक और शोध उपलब्धि के रूप में सामने आई है, जिसमें निर्माण जरूरत और औद्योगिक अपशिष्ट के उपयोग को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है।

निष्कर्ष

IIT-ISM धनबाद की यह पेटेंट प्राप्त तकनीक पारंपरिक अर्थन डैम निर्माण में मिट्टी की खपत घटाने और फ्लाई ऐश के उपयोग को बढ़ाने की दिशा में विकसित की गई है। फिलहाल इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल भविष्य के परीक्षणों और तकनीकी मूल्यांकन पर निर्भर करेगा। यदि फील्ड परीक्षणों में इसके प्रदर्शन की पुष्टि होती है, तो यह टिकाऊ और संसाधन-कुशल बांध निर्माण के लिए एक संभावित विकल्प बन सकती है।

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