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एक व्यक्ति, एक संकल्प और हरित क्रांति की आधी सदी: डॉ. कौशल किशोर जायसवाल का वनराखी आंदोलन


छतरपुर : पलामू की धरती से शुरू हुआ डॉ. कौशल किशोर जायसवाल का "वनराखी आंदोलन" आज पर्यावरण संरक्षण का एक प्रेरणादायक जन-आंदोलन बन चुका है। वर्ष 1966 के भीषण अकाल से प्रभावित होकर उन्होंने अपना जीवन वृक्षारोपण, वन संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता के लिए समर्पित कर दिया। इस वर्ष उनका वनराखी आंदोलन 50 वर्ष पूरे कर रहा है।
पिछले छह दशकों में डॉ. कौशल ने देश के 26 राज्यों के 181 जिलों तथा नेपाल, भूटान, म्यांमार, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जापान और वियतनाम सहित कई देशों में पर्यावरण संरक्षण का संदेश पहुंचाया है। उनके नेतृत्व में लगभग 59 लाख पौधों का निःशुल्क वितरण एवं रोपण तथा 26 लाख से अधिक वृक्षों पर रक्षाबंधन कर संरक्षण का संदेश दिया गया है।
छतरपुर अनुमंडल के डाली गांव में विकसित हरित क्षेत्र उनकी वर्षों की साधना का जीवंत उदाहरण है। यहां स्थित मोहनलाल खुर्जा-पार्वती देवी पार्क में 22 देशों की 200 से अधिक प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं, जो पर्यावरण प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र है।
डॉ. कौशल ने पर्यावरण संरक्षण को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ते हुए 12 फरवरी 2026 को डाली में दुनिया के पहले "पर्यावरण धर्म ज्ञान वृक्ष देव मंदिर" की स्थापना की। यहां वृक्षों को ही देवस्वरूप मानकर प्रकृति संरक्षण का संदेश दिया जाता है।
शुरुआती दिनों में लोगों ने उनके प्रयासों का मजाक उड़ाया, लेकिन उन्होंने अपना अभियान जारी रखा। कोरोना काल में ऑक्सीजन संकट के दौरान लोगों को वृक्षों और पर्यावरण के महत्व का वास्तविक एहसास हुआ। डॉ. कौशल किसानों को वृक्ष आधारित खेती अपनाने के लिए भी प्रेरित करते हैं और वृक्षों को भविष्य की आर्थिक सुरक्षा बताते हैं।
उनके योगदान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सम्मान मिला है। उनकी जीवनी सीबीएसई और आईसीएसई के पाठ्यक्रम में शामिल है तथा उन्हें लगभग 80 सम्मान प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें 10 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार शामिल हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर डॉ. कौशल किशोर जायसवाल की जीवन यात्रा यह संदेश देती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल एक अभियान नहीं, बल्कि जीवन जीने की संस्कृति है। उनका वनराखी आंदोलन साबित करता है कि एक व्यक्ति का दृढ़ संकल्प भी समाज और प्रकृति की दिशा बदल सकता है।