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सौंदा डी दुर्गा मंडप में सात दिवसीय श्रीराम कथा का समापन


कथा के अंतिम दिन केवट प्रसंग और भरत चरित्र का हुआ वर्णन, उमड़े श्रद्धालु

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भुरकुंडा। सौंदा डी दुर्गा मंडप प्रांगण में चल रहे सात दिवसीय श्रीराम कथा का मंगलवार को समापन किया गया। इस दौरान पूजा कमेटी द्वारा प्रसाद का वितरण किया गया। रामकथा के अंतिम दिन कथावाचिका देवी अदिति प्रिया पाठक ने भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े केवट प्रसंग एवं भरत चरित्र का अत्यंत भावपूर्ण और प्रेरणादायी वर्णन किया। उनके ओजस्वी प्रवचन और भक्तिमय प्रस्तुतियों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। कथा के दौरान प्रभु श्रीराम के प्रति निष्काम प्रेम, समर्पण, त्याग, सेवा और भाईचारे की महिमा को विस्तार से समझाया गया। केवट प्रसंग का वर्णन करते हुए देवी अदिति प्रिया पाठक ने बताया कि भगवान श्रीराम और केवट के बीच का संबंध केवल एक भक्त और भगवान का संबंध नहीं, बल्कि अटूट प्रेम, विश्वास और भक्ति का अद्भुत उदाहरण है। वनवास के दौरान जब प्रभु श्रीराम माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ गंगा पार करने के लिए केवट के पास पहुंचे, तब केवट ने अपनी अनन्य भक्ति और प्रेम से प्रभु का मन मोह लिया। केवट की भक्ति में किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं था, बल्कि उसके हृदय में प्रभु के प्रति अपार श्रद्धा और समर्पण था। कथावाचिका ने कहा कि केवट प्रसंग हमें सिखाता है कि भगवान पद, प्रतिष्ठा, धन-दौलत या बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम और निर्मल भाव से प्रसन्न होते हैं। प्रभु श्रीराम ने केवट को अपनाकर यह संदेश दिया कि ईश्वर की दृष्टि में सच्ची भक्ति और भाव का विशेष महत्व है। मनुष्य को भी अपने जीवन में अहंकार त्यागकर प्रेम, विनम्रता और सेवा का मार्ग अपनाना चाहिए। इसके पश्चात भरत चरित्र का वर्णन करते हुए देवी अदिति प्रिया पाठक ने भरत जी के त्याग, मर्यादा, भ्रातृप्रेम और प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट निष्ठा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भरत जी का चरित्र रामायण के सबसे प्रेरणादायी प्रसंगों में से एक है। राजसिंहासन प्राप्त होने की परिस्थिति में भी भरत जी ने सत्ता और राजपाट के मोह को स्वीकार नहीं किया, बल्कि अपने बड़े भाई श्रीराम को ही अयोध्या का वास्तविक राजा माना। भरत जी ने प्रभु श्रीराम की चरण पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित कर स्वयं सेवक और प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन किया। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा प्रेम अधिकार जताने में नहीं, बल्कि त्याग, सम्मान और समर्पण में निहित होता है। भरत जी ने अपने आचरण से सिद्ध किया कि भाई के प्रति प्रेम, परिवार के प्रति कर्तव्य और धर्म के प्रति निष्ठा मनुष्य के जीवन के सर्वोच्च आदर्श हैं। देवी अदिति प्रिया पाठक ने श्रद्धालुओं से कहा कि वर्तमान समय में भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारना अत्यंत आवश्यक है। केवट की भक्ति और भरत जी का त्याग हमें सिखाते हैं कि जीवन में सेवा, सद्भाव, पारिवारिक एकता, विनम्रता और धर्म के मार्ग पर चलना ही सच्ची सफलता है। रामकथा केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली प्रेरणा है। कथा के अंतिम दिन श्रद्धालुओं ने भावपूर्वक कथा का श्रवण किया तथा भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम को सफल बनाने में पूजा कमेटी के सचिव संजय यादव, मुखिया उपेंद्र शर्मा, दशरथ कुर्मी, अशोक शर्मा, सुशील सिंह, डब्लू पांडेय, अरविंद, राजगिरी चौधरी, कौशल सिंह, सुरेश खरवार, उमेश साव, दीपक सिंह, अजीत जसवाल, जयंत तुरी, प्रवीर चटर्जी, सहेंद्र, दीपक दुबे, मथुरा गिरी, नीरज भट्ट, उमेश रजक, प्रवीण नायक, राजेंद्र प्रसाद, बबन मिश्रा, राजू मेहता, राम पुकार, चंदन, भोला राजभर, बबलू का योगदान रहा।