जाति के ठेकेदारों, धर्म के रखवालों, एक बार इधर भी देख लो...
अमित कुमार,
रांची एक्सप्रेस ब्यूरो
देवघर : तस्वीर में दिख रहा यह परिवार किसी चुनावी पोस्टर का हिस्सा नहीं है। यह *झारखंड के देवघर जिला अंतर्गत सारठ प्रखंड के ओझाडीह-गंडा गांव का "अघनु पंडित" है, ओबीसी समाज से आता है।* साथ में उसकी पत्नी और छोटा सा बच्चा है, जो टूटी दीवारों के सामने बेबस खड़ा है।
*थोड़ी ही दूर बेहंगा गांव के "सुखदेव दास" का भी यही हाल है, जो दलित समाज से है।* दोनों की जाति अलग है, पर पीड़ा एक ही है, गरीबी और बेघरी।
जाति के ठेकेदारों, आप आते हो तो जाति पूछ कर आते हो। किसकी कितनी आबादी है, किसका वोट किधर जाएगा, इसका हिसाब लगाते हो। कोई कहता है हम दलितों के मसीहा हैं, कोई कहता है हम पिछड़ों के सिपहसालार हैं। मंचों से बड़ी-बड़ी बातें करते हो, समाज के नाम पर आंसू बहाते हो। तो आज आपके ही समाज के ये दो लोग खुले आसमान के नीचे आ गए हैं, कहां हो आप?
सुखदेव दास ने अपने कच्चे घर को बचाने के लिए प्लास्टिक डाली थी। सोचा था बारिश रुक जाएगी तो घर बच जाएगा। लेकिन प्लास्टिक गरीबी को नहीं रोक पाई। मिट्टी की दीवार भरभराकर गिर गई। अघनु पंडित दिन भर मजदूरी करता है, तब रात को चूल्हा जलता है। आज उसका बच्चा पूछ रहा है, पापा हम कहां सोएंगे? उसके पास कोई जवाब नहीं है।
इन दोनों ने आवास के लिए पंचायत के चक्कर काटे, 'सरकार आपके द्वार' में आवेदन दिया। लेकिन फाइल आगे नहीं बढ़ी। इनका आरोप है कि जिसके पास पैसा है, उसी को आवास मिलता है। क्या यही आपका सामाजिक न्याय है?
धर्म के रखवालों, जाति के ठेकेदारों हम आपसे मंदिर-मस्जिद के नाम पर लड़ने को नहीं कह रहे। हम आपसे वोट के नाम पर जाति गिनने को भी नहीं कह रहे। हम सिर्फ इतना कह रहे हैं कि अगर आप सच में दलित और ओबीसी के हितैषी हो, तो एक बार सारठ आ जाओ। इनके गिरे हुए घर को देख लो। इनके बच्चों के सिर पर हाथ रख दो। इन्हें एक आवास दिला दो।
ये तस्वीरें झारखंड की गरीबी का सच हैं। बारिश ने सिर्फ दीवार नहीं गिराई, इनके भरोसे को भी गिरा दिया है।
हे जाति-धर्म की राजनीति करने वालों, अगर थोड़ी भी मानवता बची है, तो इन दो गरीब परिवारों की मदद के लिए आगे आओ। यही सच्ची राजनीति होगी, यही सच्ची मानवता होगी।







