वॉशिंगटन। इलेक्ट्रिक वाहन, कंप्यूटर, अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले दुर्लभ खनिज यानी Rare Earths को लेकर अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। अमेरिका अपनी घरेलू खनन और प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने के लिए बड़े निवेश कर रहा है, लेकिन नई रिपोर्टों के मुताबिक चीन पर उसकी निर्भरता आने वाले वर्षों में पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं है। Reuters की 24 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले दो प्रमुख Rare Earths का घरेलू उत्पादन पिछले साल की तुलना में तीन गुना से अधिक बढ़ा है। इसके बावजूद अमेरिकी उत्पादन फिलहाल देश की कुल मांग का लगभग 42 प्रतिशत ही पूरा कर पा रहा है। रिपोर्ट में Benchmark Mineral Intelligence के आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि अगले कुछ वर्षों में घरेलू क्षमता बढ़ने के बावजूद अमेरिका को अपनी मांग का लगभग एक-चौथाई हिस्सा आयात से पूरा करना पड़ सकता है। यानी खनन और प्रोसेसिंग में निवेश बढ़ने के बाद भी बाहरी आपूर्ति की जरूरत बनी रहने वाली है। Rare Earths की पूरी सप्लाई चेन में केवल खनिज निकालना ही महत्वपूर्ण नहीं है। इन खनिजों को अलग करने, शुद्ध करने और आगे मैग्नेट तथा दूसरे औद्योगिक उत्पादों में बदलने के लिए विशेष प्रोसेसिंग सुविधाओं की जरूरत होती है। यही वह क्षेत्र है जहां चीन की पकड़ काफी मजबूत बनी हुई है। Reuters के मुताबिक, अमेरिका और दूसरे देशों की नई परियोजनाओं के बावजूद चीन का Rare Earth refining में हिस्सा लंबे समय तक बहुत बड़ा रहने का अनुमान है। IEA के अनुसार, यदि दुनिया की सभी प्रस्तावित परियोजनाएं योजना के मुताबिक शुरू भी हो जाएं, तब भी 2035 में Rare Earth refining में चीन की हिस्सेदारी करीब 70–73 प्रतिशत रह सकती है। Rare Earths आधुनिक उद्योगों के लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों की मोटर, कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, पवन ऊर्जा तकनीक, रक्षा प्रणालियों और कई उन्नत औद्योगिक उत्पादों में होता है। अमेरिकी सरकार ने भी माना है कि केवल घरेलू खदानें विकसित करना पर्याप्त नहीं है। यदि अमेरिका में खनिज निकाला जाए लेकिन उसके आगे के प्रसंस्करण के लिए उसे विदेश भेजना पड़े, तो सप्लाई चेन पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं मानी जा सकती। अमेरिकी प्रशासन ने घरेलू खनन, प्रोसेसिंग और महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। Rare Earths का मुद्दा अमेरिका-चीन व्यापार संबंधों में भी महत्वपूर्ण बन चुका है। चीन ने 2025 में कई Rare Earth तत्वों और उनसे जुड़े उत्पादों पर निर्यात नियंत्रण कड़े किए थे। इसके बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों में वैकल्पिक सप्लाई विकसित करने की कोशिशें तेज हुईं। CSIS के अनुसार, चीन के निर्यात प्रतिबंधों के बाद रक्षा, ऑटोमोबाइल और औद्योगिक सप्लाई चेन में व्यवधान देखने को मिला। 2026 में भी निर्यात लाइसेंस और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी रही। अमेरिका घरेलू Rare Earth उद्योग को बढ़ाने के साथ-साथ दूसरे देशों के साथ साझेदारी भी कर रहा है। इसमें खनन परियोजनाओं में निवेश, प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करना, कंपनियों को वित्तीय सहायता देना और रणनीतिक भंडार तैयार करना शामिल है। Reuters के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन ने 2025 से महत्वपूर्ण खनिजों से संबंधित 160 समझौतों या पहलों को मंजूरी देने अथवा आगे बढ़ाने का दावा किया है, जिनकी कुल घोषित राशि 40 अरब डॉलर से अधिक बताई गई है। अमेरिका की कोशिशों के बावजूद चीन की बढ़त केवल उत्पादन मात्रा तक सीमित नहीं है। चीन ने कई वर्षों में खनन से लेकर refining, processing और magnet manufacturing तक पूरी सप्लाई चेन विकसित की है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी USGS के एक अध्ययन के मुताबिक, 2023 में अमेरिका की Rare Earth consumption में चीन से आने वाले compounds और metals का हिस्सा करीब 67 प्रतिशत था। यह आंकड़ा बताता है कि घरेलू उत्पादन बढ़ने के बावजूद आयातित सामग्री और चीन की प्रोसेसिंग क्षमता का प्रभाव अभी काफी बड़ा है। Rare Earths की उपलब्धता सीधे कई आधुनिक उद्योगों से जुड़ी है। इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाली मोटर तकनीक, उच्च क्षमता वाले स्थायी मैग्नेट, कुछ रक्षा प्रणालियां, कंप्यूटर और अन्य हाई-टेक उपकरण इन सामग्रियों पर निर्भर करते हैं। IEA के अनुसार, आने वाले वर्षों में ऊर्जा संक्रमण, बैटरी स्टोरेज, बिजली नेटवर्क, सौर और पवन ऊर्जा तथा इलेक्ट्रिक वाहनों के विस्तार के कारण Critical Minerals की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। ऐसे में सप्लाई के कुछ ही देशों में केंद्रित रहने से उद्योगों के लिए जोखिम बढ़ सकता है। अमेरिका के सामने चुनौती केवल नई खदानें खोलने की नहीं है। उसे खनिज निकालने से लेकर refining, अलग-अलग तत्वों की processing और अंत में उच्च गुणवत्ता वाले magnets तथा दूसरे उत्पाद बनाने तक पूरी वैल्यू चेन तैयार करनी होगी। यही कारण है कि अमेरिका की मौजूदा रणनीति में घरेलू उत्पादन के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया और अन्य साझेदार देशों से सप्लाई बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है। आने वाले वर्षों में Rare Earths अमेरिका-चीन आर्थिक और रणनीतिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बने रह सकता है। अमेरिका घरेलू उत्पादन और प्रोसेसिंग को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जबकि चीन अभी भी वैश्विक refining और processing क्षमता में बड़ी हिस्सेदारी रखता है। इसलिए निकट भविष्य में अमेरिका की चीन पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त होने के बजाय धीरे-धीरे कम होने की दिशा में बढ़ सकती है। घरेलू परियोजनाओं के सफल संचालन, नई प्रोसेसिंग सुविधाओं और वैकल्पिक देशों से स्थिर आपूर्ति पर निर्भर करेगा कि यह बदलाव कितनी तेजी से होता है। कॉपीराइट नोट: यह समाचार ताजा उपलब्ध रिपोर्टों और आधिकारिक/विश्वसनीय स्रोतों के तथ्यों के आधार पर स्वतंत्र शब्दों और नए वाक्य-विन्यास में तैयार किया गया है। इसे किसी स्रोत की लाइन-दर-लाइन कॉपी नहीं किया गया है। समाचार में इस्तेमाल होने वाली फोटो, वीडियो, ग्राफिक्स या फुटेज के अधिकार अलग से जांचना जरूरी है।घरेलू उत्पादन में हुई तेज बढ़ोतरी
चीन की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ खनन नहीं
अमेरिका क्यों घटाना चाहता है चीन पर निर्भरता?
चीन के निर्यात नियंत्रण ने बढ़ाई चिंता
अमेरिका का नया प्लान क्या है?
चीन की स्थिति अभी भी मजबूत
इलेक्ट्रिक वाहन से लेकर रक्षा क्षेत्र तक असर
अमेरिका के सामने असली चुनौती
आगे क्या होगा?
दुर्लभ खनिजों पर अमेरिका की चीन पर निर्भरता बरकरार, घरेलू उत्पादन बढ़ने के बाद भी चुनौती कायम






