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क्या आपको पता है कि झारखंड में कोयला एवं लौह अयस्क जैसे खनिजों की कीमतें पड़ोसी राज्यों से काफी ज्यादा हैं?


इसके पीछे मुख्य कारण राज्य सरकार द्वारा मनमाने ढंग से लगाया जा रहा सेस है। 

उदाहरण के तौर पर थर्मल कोयला (G11) झारखंड में ₹2458 प्रति टन है, जबकि पश्चिम बंगाल में इसकी कीमत ₹1741 तथा ओडिशा में ₹1708 है। इस परिस्थिति में कोई भी ग्राहक झारखंड की जगह पड़ोसी राज्यों का कोयला ही खरीदना पसंद करेगा, जो उसे ₹700-750 प्रति टन सस्ता पड़ेगा। 

जब कोयला खनन में लगी सभी कंपनियों की कीमतें एक समान है, तो फिर अंतर टैक्स/ सेस से ज्यादा सरकार की नीयत का है। कांग्रेस ने इस देश में तथा कई राज्यों में लगातार कई दशकों तक राज किया है, तो उन्हें सब कुछ पता है। लेकिन उसके बावजूद यहाँ सरकार ने जान बुझ कर अत्यधिक सेस लगाया हुआ है, ताकि ग्राहक खनन कंपनियों से कोयला ना खरीद कर, अवैध कारोबारियों से खरीदें। 

उस अवैध डील में राज्य सरकार को ना रॉयल्टी मिलेगी, ना DMFT, ना NMET, ना GST... लेकिन सत्ता के दलालों का धंधा चलेगा, और यही इनका मुख्य मकसद है। पूरे देश में सरकारी स्तर पर अवैध कारोबार को संरक्षण देने का आपको ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा। 

जब केन्द्र सरकार ने इस अवैध बिजनेस पर MMDR संशोधन कानून के जरिए रोक लगाने का प्रयास किया, तो ये लोग भोले-भाले आदिवासियों - मूलवासियों को इसे झारखंड के अधिकारों पर हमला की तरह दिग्भ्रमित करने लगे।

झारखंड की जनता बहुत सीधी-सादी है, इन राजनैतिक दांव-पेचों को नहीं समझती, लेकिन उनके इस भोलेपन का राजनैतिक फायदा नहीं उठाया जाना चाहिए। एक बार अगर जनता के सामने आपकी असलियत खुलेगी, तो फिर जो होगा, वह आपके कल्पना से परे होगा। 

केन्द्र सरकार में विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस कर्नाटक एवं तेलंगाना जैसे राज्यों में सत्ता में है, लेकिन वहाँ इस प्रकार बिना सिर-पैर के टैक्स नहीं लगाए जाते। कांग्रेस के किसी सांसद ने संसद में भी इस बिल के विरोध में कुछ नहीं कहा, तो झारखंड में ऐसा क्यों हो रहा है?

केन्द्र सरकार द्वारा One Nation, One Tax के तहत टैक्सों के सरलीकरण के तहत लिए जा रहे निर्णयों के खिलाफ राज्य सरकार का यह कदम अनुचित है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संसद के पास इस सेस को कम करने या हटाने का अधिकार है। जब बाकी राज्यों को इस से कोई आपत्ति नहीं है, फिर झारखंड को क्यों? 

पिछले दो वर्षों में हजारों करोड़ सेस वसूलने के बावजूद, क्या आपने एक भी गाँव को प्रदूषण/ विस्थापन की समस्या से निपटने के लिए तैयार किया है? क्या इस रकम से सैंकड़ों स्मार्ट विलेज नहीं बनाए जा सकते थे? लेकिन, आपकी प्राथमिकता राज्य के संसाधनों का दोहन है, विकास नहींं।

झारखंड आंदोलन के वक्त, हम सभी ने मिल कर यहाँ रहने वाले आदिवासियों, मूलवासियों एवं विकास से कोसों दूर खड़े आम लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का सपना देखा था। इस राज्य से हमारी भावनाएं जुड़ी हुई हैं, और ऐसे बेतुके टैक्स वास्तव में क्षेत्र के विकास में रोड़ा अटकाते दिखाई देते हैं। 

राज्य सरकार को अगर राजस्व की जरूरत हो, तो वह ओडिशा की तर्ज पर नए खदानों को शुरू कर के रॉयल्टी अथवा नीलामी प्रीमियम से हजारों करोड़ रुपये कमा सकती है। केन्द्र सरकार द्वारा ऐसे कई खदानों को पहले ही क्लियरेंस दी जा चुकी है, फिर आप उसे क्यों रोक कर रखे हुए हैं? 

बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूँगा कि इस प्रकार झारखंड को अवैध धंधों का अड्डा बनाने की हर कोशिश का पुरजोर विरोध होगा। इसके लिए राज्य की जनता सड़क से लेकर सदन तक, आपके खिलाफ खड़ी होगी, और आपका सच राज्य के आखिरी आदमी तक को बताया जाएगा। 

राज्य सरकार की इस नीति की वजह से स्थानीय खनन कंपनियां भारी नुकसान में हैं, कई खदानें बंद हो चुकी हैं, हजारों लोगों की नौकरी छूट रही है, और अंततः इसका नुकसान झारखंडियों को ही उठाना पड़ेगा। झारखंड के लोगों को नुकसान पहुंचाने की यह राजनीति, सत्ताधारी दलों को भारी, बहुत भारी पड़ेगी।