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केंद्र की नीतियों पर केएन त्रिपाठी का हमला, कहा- प्राकृतिक संसाधनों पर राज्यों और ग्रामसभा का अधिकार छीना जा रहा


पलामू। पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी ने मंगलवार को प्रेसवार्ता कर केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार सत्ता के केंद्रीकरण और चुनिंदा पूंजीपति समूहों को लाभ पहुंचाने की दिशा में काम कर रही है। इसका सीधा असर देश की संघीय व्यवस्था, संविधान, आदिवासी अधिकारों, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ रहा है।

त्रिपाठी ने खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 में संशोधन और मानसून सत्र 2026 में पारित खान एवं खनिज संशोधन विधेयक, 2026 का विरोध किया। उन्होंने कहा कि राज्यों को अपने प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाली आय और सेस के माध्यम से स्थानीय विकास, विस्थापन, प्रदूषण तथा खनन से प्रभावित लोगों के पुनर्वास एवं हितों की भरपाई का अधिकार मिलना चाहिए। प्राकृतिक संसाधनों से होने वाले राजस्व पर राज्यों के अधिकार को कमजोर करना संघीय ढांचे के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

पेसा के तहत ग्रामसभा के अधिकारों की अनदेखी का आरोप

उन्होंने कहा कि झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा अधिनियम, 1996 और राज्य की नियमावली के तहत ग्रामसभा एवं स्थानीय समुदायों को विशेष अधिकार प्राप्त हैं। खनन परियोजनाओं से जुड़े फैसलों में ग्रामसभा और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों पर निर्णय का सबसे सीधा असर उसी क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी और ग्रामीण समुदायों पर पड़ता है।

त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट के समता बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले के फैसले का उल्लेख करते हुए अनुसूचित क्षेत्रों में निजी खनन गतिविधियों को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि खनन और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से जुड़े फैसले केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका असर स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, रोजगार, विस्थापन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

वन कानून में संशोधन पर भी जताई आपत्ति

पूर्व मंत्री ने वन संरक्षण कानून में 2023 में किए गए संशोधन का भी विरोध किया। उन्होंने कहा कि इससे वनभूमि, पहाड़ों और नदी-नालों पर खनन तथा औद्योगिक गतिविधियों का दबाव बढ़ने की आशंका है। उन्होंने वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत आदिवासियों और परंपरागत वनवासियों के अधिकारों को प्राथमिकता देने की मांग की।

उन्होंने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और उचित मुआवजे से जुड़े कानूनों में किए गए बदलावों पर भी आपत्ति जताई। कहा कि विकास के नाम पर स्थानीय लोगों के अधिकारों और आजीविका की कीमत नहीं चुकाई जा सकती।

त्रिपाठी ने केंद्र सरकार से मांग की कि प्राकृतिक संसाधनों पर राज्यों और स्थानीय समुदायों के संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रखे जाएं तथा आदिवासी हित, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामसभा की भूमिका को कमजोर करने वाली नीतियों पर पुनर्विचार किया जाए। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित नीतियां संविधान की संघीय भावना और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को ध्यान में रखकर ही बनाई जानी चाहिए।