नामवर सिंह ने आलोचना को दी नई दृष्टि और परंपरा : प्रो. कुमार वीरेंद्र
इप्टा की सांस्कृतिक पाठशाला की 105वीं कड़ी में ‘आलोचक नामवर सिंह और हिंदी आलोचना’ विषय पर हुआ व्याख्यान
मेदिनीनगर। इप्टा द्वारा संचालित सांस्कृतिक पाठशाला की 105वीं कड़ी का आयोजन इप्टा एवं प्रगतिशील लेखक संघ के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय आलोचक नामवर सिंह की जन्मशती के अवसर पर किया गया। कार्यक्रम में ‘आलोचक नामवर सिंह और हिंदी आलोचना’ विषय पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर एवं आलोचक प्रो. कुमार वीरेंद्र ने मुख्य वक्ता के रूप में विस्तार से व्याख्यान दिया। वहीं बीएचयू के फारसी विभाग के सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष डॉ. हसन अब्बास मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता इप्टा पलामू के अध्यक्ष प्रेम भसीन ने की।
कार्यक्रम के प्रारंभ में इप्टा की ओर से प्रो. कुमार वीरेंद्र एवं डॉ. हसन अब्बास को प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया। मुख्य अतिथि डॉ. हसन अब्बास ने कहा कि नामवर सिंह ‘ऑल ट्रेड’ के व्यक्ति थे। उनमें हर विषय पर अपनी बात रखने की अद्भुत क्षमता थी। उनका अध्ययन और अनुभव उन्हें किसी भी विषय पर बोलने से रोक नहीं पाता था। हिंदी-उर्दू साहित्य से लेकर राजनीतिक एवं सामाजिक सरोकारों तक वे बेबाकी से अपनी बात रखते थे।
उन्होंने प्रेमचंद के संदर्भ में कहा कि प्रेमचंद ने करीब 100-150 पृष्ठों की एक पुस्तक ‘महात्मा शेख सादी’ लिखी थी, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक को केवल बच्चों के लिए लिखी गई रचना मानकर आगे बढ़ जाना उचित नहीं है, बल्कि इसमें समाज के व्यापक सरोकारों को समझने की दृष्टि भी मौजूद है।
इसके बाद मुख्य वक्ता प्रो. कुमार वीरेंद्र ने ‘आलोचक नामवर सिंह और हिंदी आलोचना’ विषय पर अपना व्याख्यान शुरू किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार प्रेमचंद ने कहानी लेखन में एक नई परंपरा की शुरुआत कर उसे स्थापित किया, उसी प्रकार हिंदी आलोचना के क्षेत्र में नई दृष्टि और परंपरा विकसित करने का महत्वपूर्ण कार्य नामवर सिंह ने किया।
उन्होंने कहा कि नामवर सिंह कहा करते थे—“जो गुत्थी सुलझ गई है, उसे उलझा रहा हूं।” आलोचना के संदर्भ में उनका मानना था कि साहित्य में पहले से सुलझी हुई गुत्थियों को फिर से उलझाकर उनके भीतर छिपे नए अर्थों और सवालों को सामने लाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी आलोचना में आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाद यदि किसी आलोचक ने व्यापक प्रभाव छोड़ा, तो उनमें नामवर सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
प्रो. कुमार वीरेंद्र ने कहा कि नामवर सिंह ने कम उम्र में ही महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखनी शुरू कर दी थीं। उनकी पहली पुस्तक तब प्रकाशित हुई, जब वे महज 24 वर्ष के थे। ‘छायावाद’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक उन्होंने 28 वर्ष की उम्र में लिखी और बताया जाता है कि इसे लिखने में उन्हें महज 11 दिन लगे। बाद के दौर में नामवर सिंह ने लिखने की अपेक्षा बोलने और व्याख्यान देने की परंपरा को अधिक अपनाया। इस अर्थ में उन्हें वाचिक परंपरा का महत्वपूर्ण आलोचक कहा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की वाचिक परंपरा को कबीर और नानक की परंपरा से जोड़कर भी देखा जा सकता है। उनके व्याख्यानों को रिकॉर्ड कर डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने ‘आलोचक के मुख से’ नामक पुस्तक का संपादन किया। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी व्यक्ति या विचार की आलोचना करते हुए भी उसे एकांगी ढंग से नहीं देखते थे।
प्रो. कुमार वीरेंद्र ने कहा कि यदि नामवर सिंह ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना की, तो इसका अर्थ यह नहीं था कि वे शुक्ल के विरोधी थे। उनकी आलोचना का उद्देश्य साहित्य को नए सिरे से देखने की दृष्टि विकसित करना था। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह को कई साहित्यकारों, यहां तक कि प्रगतिशील साहित्यकारों की ओर से भी तीखी आलोचना झेलनी पड़ी। उनकी अपनी आलोचना पर प्रतिक्रिया देने के बजाय उनकी आंखों की चुहल और सहज मुस्कान भी कई बार लोगों को असहज कर देती थी।
उन्होंने कहा कि नामवर सिंह साहित्य की आलोचना करते समय उसके केंद्रीय बिंदु को तलाशते थे। उनकी पुस्तक ‘कविता के नये प्रतिमान’ इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें मुक्तिबोध को केंद्र में रखकर नई कविता के विभिन्न प्रतिमानों को परखा गया। आलोचना की इसी प्रक्रिया में उन्हें अपने ही वैचारिक खेमे के लोगों से भी टकराना पड़ा।
प्रो. कुमार वीरेंद्र ने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना धीरे-धीरे व्यक्ति-केंद्रित विवादों में भी घिरती गई। हरिशंकर परसाई ने नामवर सिंह को केंद्र में रखकर ‘एक बात और थी इस जालिम में’ शीर्षक से आलेख लिखा था। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना का मूल उद्देश्य जनता के हितों को सामने रखना था। हिंदी आलोचना में नई परंपरा स्थापित करने के लिए उन्हें कई स्तरों पर कीमत भी चुकानी पड़ी। आज के समय में नामवर सिंह के साहित्य, आलोचना-दृष्टि और वैचारिक भूमिका को नए सिरे से जानना और समझना जरूरी है।
कार्यक्रम में अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय सचिव केडी सिंह, संत मरियम स्कूल के चेयरपर्सन अविनाश देव, वरिष्ठ शायर अमीन रहबर, एमजे अजहर, श्यामदेव मेहता, प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव नुदरत नवाज, आइसा के गौतम दांगी, इप्टा के राष्ट्रीय सचिव शैलेंद्र कुमार, जिला सचिव रवि शंकर, उपेंद्र कुमार मिश्रा, ललन प्रजापति, प्रवीण दुबे, संजीव कुमार संजू, राजीव रंजन, अजीत कुमार सहित शिक्षक संघ, इप्टा के रंगकर्मी तथा विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े लोग उपस्थित थे।
कार्यक्रम का संचालन शिक्षक अच्छे लाल प्रजापति ने किया। अंत में इप्टा पलामू के अध्यक्ष प्रेम भसीन ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कार्यक्रम के समापन की घोषणा की।





