अस्पताल में इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले मेडिकल सामान की कीमतों को लेकर केंद्र सरकार का ध्यान बढ़ा है। मामला खास तौर पर उन मेडिकल कंज्यूमेबल्स का है, जिनकी अस्पतालों की खरीद कीमत और मरीजों के बिल में दर्ज कीमत के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। महाराष्ट्र FDA के एक सर्वे के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया और अब केंद्र ने नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी NPPA से इस संबंध में रिपोर्ट मांगी है। महाराष्ट्र FDA की ओर से किए गए सर्वे में IV सेट, सिरिंज, कैथेटर और दूसरे अस्पतालों में रोजाना इस्तेमाल होने वाले सामान की खरीद कीमत और MRP के बीच काफी अंतर दर्ज किया गया। रिपोर्ट में एक IV इन्फ्यूजन सेट की ट्रेड कीमत ₹11.05 बताई गई, जबकि उसी उत्पाद पर ₹325 की MRP दर्ज थी। इसी तरह ₹6.75 में खरीदी गई सिरिंज पर ₹57.20 की MRP और ₹29.41 में खरीदे गए कैथेटर पर ₹310 की MRP का उदाहरण सामने आया। इन आंकड़ों ने इस सवाल को सामने ला दिया है कि मेडिकल सामान की कीमत तय करते समय खरीद लागत, डिस्ट्रीब्यूटर मार्जिन, अस्पताल के खर्च और मरीज से वसूली जाने वाली राशि के बीच कितना अंतर उचित माना जाना चाहिए। महाराष्ट्र FDA के निष्कर्षों के बाद केंद्र के Department of Pharmaceuticals ने NPPA से मामले की जांच और विश्लेषण से जुड़ी रिपोर्ट मांगी है। विभाग रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई पर विचार करेगा। इसका मतलब फिलहाल यह नहीं है कि सरकार ने सभी मेडिकल सामान की कीमतों पर नया मूल्य-नियंत्रण लागू कर दिया है। अभी मुख्य फोकस कीमतों में असामान्य अंतर की पड़ताल और मौजूदा नियमों के तहत संभावित कार्रवाई पर है। मेडिकल कंज्यूमेबल्स सामान्य बाजार के सामान की तरह नहीं होते। मरीज को अस्पताल में भर्ती होने के बाद कई सामानों की तत्काल जरूरत पड़ती है। ऐसे में उसके पास अलग-अलग दुकानों या ब्रांडों की कीमतों की तुलना करने का सीमित अवसर होता है। यही वजह है कि अगर किसी मेडिकल उत्पाद की खरीद कीमत और मरीज के बिल में दर्ज कीमत के बीच बड़ा अंतर हो, तो बिल की पारदर्शिता महत्वपूर्ण हो जाती है। महाराष्ट्र FDA के आयुक्त तुकाराम मुंढे ने भी इसी अंतर को लेकर सवाल उठाया है और कहा है कि कीमत तय करने की प्रक्रिया अधिक तार्किक और पारदर्शी होनी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी निश्चित प्रतिशत का मूल्य-मार्जिन तय करना अंतिम रूप से नियामक और संबंधित हितधारकों के विचार का विषय होगा। नहीं। यह एक महत्वपूर्ण बात है। NPPA कुछ आवश्यक दवाओं और मेडिकल डिवाइसेज के लिए ceiling price तय करता है। उदाहरण के लिए, केंद्र सरकार के मार्च 2026 के आधिकारिक जवाब के अनुसार, कोरोनरी स्टेंट और ऑर्थोपेडिक नी इम्प्लांट जैसे कुछ उत्पाद मूल्य नियंत्रण के दायरे में हैं। इसके अलावा कुछ मेडिकल डिवाइसेज पर पहले Trade Margin Rationalisation भी लागू किया गया था। इसमें पल्स ऑक्सीमीटर, ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग मशीन, नेबुलाइजर, डिजिटल थर्मामीटर और ग्लूकोमीटर जैसे उपकरण शामिल थे। वहीं, गैर-सूचीबद्ध मेडिकल डिवाइसेज के मामले में मौजूदा व्यवस्था के तहत MRP में पिछले 12 महीनों की MRP की तुलना में 10% से अधिक वृद्धि नहीं की जा सकती। NPPA को कीमतों की निगरानी और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई का अधिकार है। फिलहाल ऐसा कहना सही नहीं होगा। मार्च 2026 में सरकार ने संसद में स्पष्ट किया था कि “One Nation, One Price” व्यवस्था या सभी आवश्यक मेडिकल डिवाइसेज पर देशव्यापी एक समान price cap का कोई प्रस्ताव उस समय विचाराधीन नहीं था। मौजूदा ताजा घटनाक्रम में भी केंद्र की ओर से NPPA से रिपोर्ट मांगे जाने की बात सामने आई है। इसलिए आगे क्या नियामकीय बदलाव होंगे, यह रिपोर्ट और सरकार के अगले फैसलों पर निर्भर करेगा। मामले में आगे कुछ संभावित कदमों पर चर्चा हो सकती है: हालांकि, इन संभावित कदमों में से किसी को भी अभी लागू सरकारी फैसला नहीं माना जाना चाहिए। अंतिम निर्णय संबंधित विभागों और हितधारकों की समीक्षा के बाद ही स्पष्ट होगा। अगर सरकार मेडिकल सामान की कीमतों में अत्यधिक अंतर को नियंत्रित करने के लिए कोई नई व्यवस्था लागू करती है, तो इसका सीधा असर अस्पताल के बिल पर पड़ सकता है। खासकर लंबे समय तक भर्ती रहने वाले या सर्जरी कराने वाले मरीजों के लिए कई छोटे-छोटे मेडिकल कंज्यूमेबल्स का कुल खर्च महत्वपूर्ण हो सकता है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मुद्दा केवल कीमत कम करना नहीं, बल्कि मरीज को यह स्पष्ट जानकारी देना है कि इस्तेमाल किए गए मेडिकल सामान की कीमत कैसे तय हुई और उसके बिल में कितनी राशि जोड़ी गई। अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल सामान की कीमतों को लेकर महाराष्ट्र से सामने आए आंकड़ों ने MRP और वास्तविक खरीद कीमत के बीच अंतर पर राष्ट्रीय बहस शुरू कर दी है। केंद्र ने अब NPPA से रिपोर्ट मांगी है, जिसके बाद यह पता चलेगा कि मौजूदा नियमों में बदलाव या अतिरिक्त निगरानी की जरूरत है या नहीं। फिलहाल यह मामला मरीजों के लिए पारदर्शी बिलिंग, मेडिकल सामान की उचित कीमत और नियामकीय निगरानी से जुड़ा हुआ है। सरकार की अगली कार्रवाई NPPA की समीक्षा और संबंधित पक्षों से मिलने वाली जानकारी के बाद सामने आ सकती है।महाराष्ट्र के सर्वे में क्या सामने आया?
केंद्र ने NPPA से क्यों मांगी रिपोर्ट?
मरीजों के लिए समस्या क्या है?
क्या हर मेडिकल सामान की कीमत पर सरकार का नियंत्रण है?
क्या सभी मेडिकल सामान के लिए एक समान कीमत तय होगी?
आगे क्या हो सकता है?
आम मरीज पर क्या असर पड़ेगा?
निष्कर्ष
अस्पतालों में मेडिकल सामान की कीमतों पर केंद्र की नजर, अब कीमतों के अंतर की होगी पड़ताल






