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अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा के लिए सेफ्टी ऑडिट पर जोर


अस्पतालों में मरीजों को सुरक्षित इलाज उपलब्ध कराने और किसी भी तरह की लापरवाही या जोखिम को समय रहते पहचानने के लिए सेफ्टी ऑडिट महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें अस्पताल की इमारत से लेकर ICU, ऑपरेशन थिएटर, दवा प्रबंधन, संक्रमण नियंत्रण और इमरजेंसी सेवाओं तक कई स्तरों पर सुरक्षा व्यवस्था की जांच की जाती है।

हाल के महीनों में अस्पतालों में फायर सेफ्टी और ICU सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। केंद्र के स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2026 में हेल्थकेयर संस्थानों के लिए Fire and Life Safety से जुड़ी राष्ट्रीय गाइडलाइंस जारी की हैं, जिनमें ICU, NICU, PICU और ऑपरेशन थिएटर जैसे हाई-रिस्क क्षेत्रों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा प्रोटोकॉल शामिल हैं।

सेफ्टी ऑडिट में क्या-क्या जांचा जाता है?

सेफ्टी ऑडिट का उद्देश्य सिर्फ अस्पताल की बिल्डिंग की जांच करना नहीं है। इसमें मरीज के इलाज से जुड़े अलग-अलग स्तरों को देखा जाता है, जैसे:

  • फायर सेफ्टी: फायर अलार्म, extinguishers, sprinkler system, emergency exits और evacuation व्यवस्था।
  • ICU और OT सुरक्षा: जरूरी उपकरणों की उपलब्धता, मॉनिटरिंग सिस्टम और आपातकालीन तैयारियां।
  • दवा सुरक्षा: सही मरीज को सही दवा और सही मात्रा देने की प्रक्रिया।
  • इन्फेक्शन कंट्रोल: हाथों की स्वच्छता, मेडिकल उपकरणों की सफाई और संक्रमण रोकने के प्रोटोकॉल।
  • इमरजेंसी सेवाएं: ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, इमरजेंसी दवाओं और अन्य life-saving उपकरणों की उपलब्धता।
  • मरीज की पहचान: गलत मरीज को गलत दवा या उपचार दिए जाने के जोखिम को रोकने की व्यवस्था।
  • मेडिकल रिकॉर्ड: इलाज, दवाओं और प्रक्रियाओं का सही दस्तावेजीकरण।
  • स्टाफ की ट्रेनिंग: डॉक्टरों, नर्सों और अन्य कर्मचारियों को आपात स्थिति से निपटने की ट्रेनिंग।

NABH के अस्पताल मानकों में भी एक व्यवस्थित patient safety programme, multidisciplinary safety committee और patient-safety risks के proactive analysis पर जोर दिया गया है।

ICU और ऑपरेशन थिएटर पर खास ध्यान

ICU, NICU, PICU और ऑपरेशन थिएटर अस्पताल के सबसे संवेदनशील हिस्सों में आते हैं। यहां बिजली, ऑक्सीजन, वेंटिलेशन, उपकरण और इमरजेंसी रिस्पॉन्स में छोटी सी कमी भी गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है।

इसी वजह से 2026 की केंद्रीय Fire and Life Safety Guidelines में इन हाई-रिस्क क्षेत्रों के लिए विशेष प्रोटोकॉल पर जोर दिया गया है।

राज्यों में भी अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था की जांच के लिए निरीक्षण और ऑडिट किए जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर राजस्थान में सरकारी और निजी अस्पतालों के ICU की सुरक्षा जांच के निर्देश दिए गए हैं।

मरीजों की सुरक्षा में ऑडिट क्यों जरूरी?

कई बार किसी दुर्घटना के बाद जांच करने के बजाय पहले से मौजूद जोखिमों को पहचानना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी अस्पताल में emergency exit बंद है, fire alarm काम नहीं कर रहा या ऑक्सीजन सप्लाई की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है, तो ऑडिट इन कमियों को घटना से पहले सामने ला सकता है।

NABH के मानकों में भी अस्पतालों को patient-safety risks का proactive analysis करने और सुधारात्मक कदम उठाने की व्यवस्था रखने की बात कही गई है।

सिर्फ कमी ढूंढना नहीं, सुधार भी जरूरी

एक प्रभावी सेफ्टी ऑडिट का मकसद केवल अस्पताल को कमियां बताना नहीं होना चाहिए। ऑडिट के बाद यह तय करना भी जरूरी है कि:

  1. समस्या कहां है?
  2. उसका मरीजों पर संभावित प्रभाव क्या है?
  3. जिम्मेदारी किसकी है?
  4. सुधार कब तक किया जाएगा?
  5. सुधार के बाद दोबारा जांच कैसे होगी?

NABH की व्यवस्था में भी onsite assessment के साथ corrective actions और आगे surveillance assessment का प्रावधान है।

संक्रमण नियंत्रण भी ऑडिट का अहम हिस्सा

अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा सिर्फ दुर्घटनाओं से बचाव तक सीमित नहीं है। Hospital-acquired infections को रोकना भी patient safety का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इसी दिशा में National Health Systems Resource Centre (NHSRC) की NQAS व्यवस्था में healthcare-associated infections की surveillance और reporting के लिए अलग तकनीकी दिशानिर्देश उपलब्ध हैं।

मरीजों और परिजनों को क्या फायदा?

अगर सेफ्टी ऑडिट नियमित और प्रभावी तरीके से किए जाएं, तो मरीजों को सुरक्षित वातावरण मिलने की संभावना बढ़ती है। अस्पताल में emergency preparedness, infection control, medication safety और clinical procedures की निगरानी मजबूत हो सकती है।

NABH के अनुसार accreditation framework में patient safety, medication management, infection control, medical records और adverse events की रोकथाम जैसे क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाता है।

निष्कर्ष

अस्पतालों में सेफ्टी ऑडिट का उद्देश्य इलाज के दौरान संभावित जोखिमों को पहले पहचानना और उन्हें दूर करना है। फायर सेफ्टी, ICU सुरक्षा, संक्रमण नियंत्रण, दवा प्रबंधन और इमरजेंसी रिस्पॉन्स जैसे क्षेत्रों की नियमित जांच मरीजों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत कर सकती है।

2026 में केंद्र की Fire and Life Safety Guidelines और अस्पतालों के लिए NABH जैसे गुणवत्ता मानकों के चलते सुरक्षा ऑडिट और नियमित निगरानी पर बढ़ता जोर अस्पतालों में सुरक्षित और जवाबदेह स्वास्थ्य सेवाओं की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।