दवाओं और फार्मास्युटिकल कंपनियों की निगरानी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की चुनौती खारिज करते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। इस फैसले का संबंध Drugs and Cosmetics Act के तहत केंद्रीय और राज्य ड्रग अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र से है। मामला एक फार्मास्युटिकल कंपनी के खिलाफ की गई नियामकीय कार्रवाई से जुड़ा था। विवाद इस बात पर था कि Central Drugs Standard Control Organization (CDSCO) के ड्रग इंस्पेक्टर को Drugs and Cosmetics Act के Chapter IV के तहत किसी कंपनी का स्वतंत्र रूप से निरीक्षण करने, दवाओं के सैंपल लेने और उसके आधार पर अभियोजन शुरू करने का अधिकार है या नहीं। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने माना था कि इस प्रावधान के तहत संबंधित अधिकार मुख्य रूप से राज्य के ड्रग अधिकारियों के पास हैं और केंद्रीय ड्रग नियामक के अधिकारी अपने स्तर पर ऐसी कार्रवाई नहीं कर सकते। केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की याचिका को खारिज कर दिया और हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया। यह आदेश मंगलवार को दिया गया और इसकी रिपोर्ट 17 सितंबर 2026 को सामने आई। इससे ड्रग रेगुलेशन में केंद्र और राज्यों के अधिकार क्षेत्र को लेकर हाईकोर्ट की व्याख्या फिलहाल कायम रहती है। CDSCO भारत का केंद्रीय दवा नियामक है और देश में दवाओं तथा मेडिकल उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण नियामकीय कार्य करता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में मुद्दा यह था कि Drugs and Cosmetics Act के Chapter IV के तहत कार्रवाई करने की वैधानिक शक्ति किस प्राधिकरण के पास है। फैसले के बाद केंद्रीय अधिकारियों द्वारा की जाने वाली ऐसी प्रवर्तन कार्रवाई के लिए संबंधित कानूनी अधिकार और क्षेत्राधिकार महत्वपूर्ण हो जाएंगे। इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू राज्यों के ड्रग कंट्रोल प्रशासन से जुड़ा है। हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार, संबंधित राज्य प्राधिकरणों के पास अपने क्षेत्र में दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण से जुड़े Chapter IV के प्रावधानों को लागू करने की शक्ति है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र की चुनौती खारिज किए जाने से यह स्थिति बरकरार रही है। फार्मास्युटिकल कंपनियों के लिए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ड्रग इंस्पेक्शन, सैंपलिंग और अभियोजन जैसी कार्रवाई में कौन-सा अधिकारी किस कानूनी प्रावधान के तहत कार्रवाई कर सकता है, यह स्पष्ट होना जरूरी है। इससे कंपनियों और नियामक एजेंसियों के बीच होने वाले विवादों में अधिकार क्षेत्र का सवाल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि दवा कंपनियां नियामकीय निगरानी से बाहर हो गई हैं। राज्य और केंद्र दोनों के पास कानून के तहत अलग-अलग भूमिकाएं और शक्तियां हैं। दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी नियामकीय व्यवस्था जरूरी है। इस फैसले का सीधा असर किसी विशेष दवा की कीमत या उसकी बिक्री पर प्रतिबंध के रूप में नहीं है। इसका मुख्य मुद्दा ड्रग रेगुलेशन की प्रक्रिया और प्रवर्तन अधिकारों का बंटवारा है। आगे चलकर केंद्र और राज्य की नियामकीय एजेंसियों को अपनी कार्रवाई करते समय संबंधित कानून में निर्धारित अधिकार क्षेत्र का विशेष ध्यान रखना होगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने केंद्र और राज्य के बीच ड्रग रेगुलेशन से जुड़े अधिकार क्षेत्र को लेकर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने केंद्र की चुनौती खारिज कर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया, जिसमें Chapter IV के तहत केंद्रीय ड्रग इंस्पेक्टर की स्वतंत्र निरीक्षण, सैंपलिंग और अभियोजन की शक्ति पर सवाल उठाया गया था। नोट: यह फैसला मुख्यतः नियामकीय अधिकार क्षेत्र से जुड़ा है; इसे सभी प्रकार की ड्रग रेगुलेशन शक्तियों पर CDSCO की शक्ति खत्म होने के रूप में नहीं समझना चाहिए।क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
CDSCO के लिए इसका क्या मतलब?
राज्य ड्रग अधिकारियों की भूमिका
फार्मा कंपनियों पर क्या असर हो सकता है?
मरीजों के लिए इसका क्या महत्व है?
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का ड्रग रेगुलेशन पर अहम फैसला, CDSCO की शक्तियों को लेकर स्थिति साफ






