BREAKING NEWS

logo

क्या बीएसएल ने वादा निभाया या जिम्मेदारी ठेका कंपनी को सौंप दी?


मृतक कर्मचारी सुभाष चंद्र मोदी के आश्रित के नियोजन पर उठे सवाल

बोकारो से विशेष रिपोर्ट

अलका मिश्रा

बोकारो स्टील प्लांट (बीएसएल) के एसएमएस एवं सीसीएस विभाग में कार्यरत सुभाष चंद्र मोदी  (स्टाफ संख्या-763509) की ड्यूटी के दौरान हुई दुर्घटना के बाद इलाज के क्रम में 17 जुलाई को मौत हो गई थी। घटना के बाद परिजनों और विभिन्न श्रमिक संगठनों ने आश्रित को बीएसएल में अनुकंपा नियुक्ति, मुआवजा तथा अन्य सेवा लाभ देने की मांग को लेकर आंदोलन किया। 12 दिनों तक मृतक मोदी की लाश शवगृह में पड़ी रही और उनका परिवार करता रहा आंदोलन। इस बीच भाजपा - आजसू के नेता, सांसद ढुल्लू महतो, पूर्व विधायक गोमिया लम्बोदर महतो  भी मृतक के परिजनों के समर्थन में आए, एसडीओ( चास )ने भी मृतक  की पत्नी का अनशन समाप्त करवाना चाहा। अंततः  जिला प्रशासन की मध्यस्थता के बाद आंदोलन समाप्त हुआ और बीएसएल प्रबंधन की ओर से आश्रित को नियोजन देने का आश्वासन दिए जाने की जानकारी सामने आई। बोकारो उपायुक्त अभयनाथ झा ने जूस पिलाकर मृतक की पत्नी सोनमणी देवी का अनशन तोड़वाया लेकिन बोकारो स्टील प्लांट प्रबन्धन ने वही दिया जो वह पहले दिन से ही देने को तैयार था अर्थात ठेकेदार के यहां ठेकाकर्मी की नौकरी।

 

अब इस पूरे प्रकरण में एक नया सवाल उठ रहा है।

सवाल यह है कि नौकरी किसने दी?

स्थानीय स्तर पर ऐसी जानकारी सामने आ रही है कि मृतक सुभाष चंद्र मोदी के दूसरे पुत्र को बीएसएल के नियमित कर्मचारी के रूप में नियुक्त नहीं किया गया, बल्कि बीएसएल परिसर में कार्यरत एक ठेका एजेंसी हाईटेक इंटरप्राइजेज में स्किल्ड लेबर के रूप में कार्य दिया गया है।

हालाँकि, इस दावे की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि बीएसएल या सेल प्रबंधन द्वारा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस जानकारी को स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जाना अभी शेष है।

यदि यह तथ्य सही है तो कई प्रश्न उठते हैं

आंदोलन के दौरान दिया गया आश्वासन बीएसएल में अनुकंपा नियुक्ति का था या केवल किसी प्रकार के रोजगार का?
क्या ठेका कंपनी में दिया गया रोजगार बीएसएल की अनुकंपा नियुक्ति नीति के अनुरूप माना जाएगा?
क्या आश्रित को बीएसएल कर्मचारी के समान वेतन, सेवा सुरक्षा, चिकित्सा सुविधा, भविष्य निधि और अन्य लाभ प्राप्त होंगे?
यदि नहीं, तो क्या आंदोलन के दौरान किए गए आश्वासन की भावना का पालन हुआ?
पारदर्शिता की आवश्यकता

इस मामले में भ्रम की स्थिति समाप्त करने के लिए बीएसएल प्रबंधन को निम्नलिखित बिंदुओं पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण देना चाहिए—

क्या आश्रित को बीएसएल में नियमित नियुक्ति दी गई?
यदि नहीं, तो किस आधार पर ठेका कंपनी में नियोजन कराया गया?
क्या यह व्यवस्था अस्थायी है या भविष्य में बीएसएल में नियुक्ति दी जाएगी?
क्या आश्रित ने स्वेच्छा से ठेका कंपनी का रोजगार स्वीकार किया है?
फिलहाल इस रिपोर्ट के प्रकाशन तक नियुक्ति-पत्र, बीएसएल का आधिकारिक आदेश अथवा हाईटेक इंटरप्राइजेज के माध्यम से नियोजन संबंधी कोई सार्वजनिक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हो सका है। 

      बहरहाल,सुभाष चंद्र मोदी की मृत्यु के बाद दिया गया आश्वासन सामाजिक और मानवीय दृष्टि से महत्वपूर्ण था। यदि आश्रित को वास्तव में केवल ठेका कंपनी में नियोजित किया गया है, तो यह केवल एक रोजगार का प्रश्न नहीं, बल्कि अनुकंपा नियुक्ति की प्रकृति, श्रमिक अधिकारों और सार्वजनिक उपक्रमों की जवाबदेही का भी विषय बन जाता है।

इस मामले में बीएसएल प्रबंधन की ओर से स्पष्ट और लिखित स्पष्टीकरण आने तक यह मुद्दा चर्चा और जांच का विषय बना रहेगा।