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देवघर नगर आयुक्त का तुगलकी फ़रमान, जनप्रतिनिधियों से भी पहचान पत्र की मांग


देवघर नगर आयुक्त का तुगलकी फ़रमान, जनप्रतिनिधियों से भी पहचान पत्र की मांग 


• सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी


अमित कुमार,
रांची एक्सप्रेस ब्यूरो 

देवघर : देवघर नगर निगम की आयुक्त सुलोचना मीणा द्वारा जारी कार्यालय आदेश पत्रांक-1951, दिनांक-18.09.2026 इन दिनों विवादों में है। 

जारी आदेश में कहा गया है कि कर्मियों से दुर्व्यवहार को देखते हुए सुरक्षा और भयमुक्त वातावरण के लिए कार्यालय में आने वाले सभी पदाधिकारी, नियमित/अनुबंध/अस्थाई कर्मी और सभी माननीय जनप्रतिनिधियों को कार्यालय द्वारा निर्गत पहचान पत्र के साथ आना अनिवार्य होगा।

उल्लेखनीय है कि झारखंड नगरपालिका अधिनियम-2011 में जनप्रतिनिधि शब्द की अलग से परिभाषा नहीं है, लेकिन धारा 15 - परिषद का गठन स्पष्ट करती है कि नगर निगम की परिषद में कौन जनप्रतिनिधि है।

1. निर्वाचित पार्षद: धारा 15(2)(a) के अनुसार वार्डों से चुने गए पार्षद परिषद के सदस्य हैं।
2. महापौर/उपमहापौर: धारा 26 के तहत महापौर का चुनाव नगर निगम क्षेत्र के सभी मतदाताओं द्वारा सीधे किया जाता है, वह परिषद के अध्यक्ष होते हैं।
3. पदेन सदस्य: धारा 15(2)(b) के अनुसार क्षेत्र के विधायक, सांसद भी परिषद के सदस्य होते हैं, हालांकि उन्हें मत देने का अधिकार नहीं है।

अधिनियम की धारा-55 के तहत नगर आयुक्त निगम के अधिकारी हैं, जो परिषद के अधीन कार्य करते हैं, जबकि धारा-23 के तहत महापौर, परिषद और स्थायी समिति निगम की सत्ता हैं।

कानूनी जानकारों का कहना है कि जनप्रतिनिधि निगम के कर्मचारी नहीं, बल्कि उसके मालिक हैं। नगर निगम अधिनियम में कहीं भी जनप्रतिनिधियों के प्रवेश के लिए पहचान पत्र (I-Card) अनिवार्य करने का प्रावधान नहीं है।

*क्या है सुप्रीम कोर्ट का आदेश..?* 

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में स्पष्ट तौर पर कहा है कि- *"नगरपालिका/नगर परिषद्/नगर निगम* जैसे सार्वजनिक पदों पर चुने गए प्रतिनिधियों को उनके रोज़मर्रा के कामकाज में उचित सम्मान और स्वायत्तता मिलनी चाहिए।" 

महापौर नगर के प्रथम नागरिक होते है। उन्हें अपने ही कार्यालय में पहचान पत्र दिखाकर घुसना पड़े, यह अधिनियम की भावना के विपरीत है।

आदेश में सभी जनप्रतिनिधियों को नियमित और अस्थाई कर्मियों की श्रेणी में रख दिया गया है, जो अपमानजनक है। सुरक्षा के नाम पर जनप्रतिनिधियों की आवाजाही रोकना जनता और निगम के बीच दूरी बढ़ाएगा।

नगर आयुक्त के इस तुगलकी फ़रमान के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधियों और पार्षदों में भारी नाराजगी है। मांग उठ रही है कि नगर आयुक्त इस आदेश को तुरंत वापस लें।