नई दिल्ली, 18 सितंबर 2026: भारत इस साल कमजोर मानसून के दौर से गुजर रहा है और बारिश की कमी ने कृषि उत्पादन तथा खाद्य कीमतों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, जून-सितंबर मानसून सीजन में अब तक देश में सामान्य से करीब 15% कम बारिश दर्ज हुई है। यदि यह कमी बनी रहती है, तो 2026 का मानसून 2009 के बाद सबसे कमजोर रह सकता है। मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, इस साल प्रशांत महासागर में मजबूत हो रहा El Niño भारतीय मानसून के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा कर रहा है। हालांकि El Niño और भारतीय बारिश के बीच संबंध महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी एक मौसम प्रणाली के आधार पर पूरे मानसून के क्षेत्रीय परिणामों को निश्चित नहीं माना जा सकता। कम बारिश का असर खासतौर पर उन क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है जहां खेती सिंचाई के बजाय मानसूनी पानी पर अधिक निर्भर है। इस साल कमजोर बारिश के कारण धान, सोयाबीन, कपास, मक्का और अन्य खरीफ फसलों के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखना चुनौतीपूर्ण रहा है। सितंबर की बारिश भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई खरीफ फसलें इस समय दाना भरने, फलियां बनने और उत्पादन के अंतिम चरण में होती हैं। लंबे समय तक सूखा रहने के बाद अचानक तेज बारिश होने पर भी खेती को नुकसान पहुंच सकता है। कम कृषि उत्पादन की स्थिति में सब्जियों, दालों, तिलहन और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसी वजह से कमजोर मानसून को लेकर food inflation की चिंता भी सामने आ रही है। हालांकि सरकार की ओर से खाद्य आपूर्ति और भंडार की स्थिति को देखते हुए कीमतों पर नियंत्रण के उपाय किए जा सकते हैं। वहीं, मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने सितंबर में कहा था कि अगस्त में करीब 6% रही food inflation साल के अंत तक लगातार ऊंची रहने की संभावना नहीं है और मानसून की कमी को उन्होंने प्रबंधनीय बताया था। इसलिए बारिश की कमी और महंगाई के बीच सीधा और निश्चित संबंध मानना अभी जल्दबाजी होगी। मानसून की कमी पूरे देश में समान नहीं है। कुछ क्षेत्रों में सामान्य या अपेक्षाकृत बेहतर बारिश हुई है, जबकि कई राज्यों और उप-क्षेत्रों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। इससे कृषि पर प्रभाव भी फसल और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग रहने की संभावना है। मानसून सीजन समाप्त होने तक होने वाली बारिश और उसके भौगोलिक वितरण से वास्तविक कृषि प्रभाव का आकलन अधिक स्पष्ट होगा। इसके साथ ही मिट्टी की नमी, जलाशयों की स्थिति, सिंचाई उपलब्धता और रबी फसलों की बुवाई भी महत्वपूर्ण कारक होंगे। फिलहाल उपलब्ध आंकड़े यह संकेत देते हैं कि 2026 का मानसून सामान्य से काफी कमजोर रहा है, जिससे कृषि और खाद्य कीमतों पर जोखिम बढ़ा है। लेकिन इसे देश का “सबसे सूखा मानसून” घोषित करने से पहले अंतिम मौसमी आंकड़ों का इंतजार जरूरी है।El Niño से जुड़ी मौसम की चुनौती
बारिश की कमी से फसलों पर असर
खाद्य महंगाई पर नजर
क्षेत्रीय स्थिति एक जैसी नहीं
आगे के आंकड़े होंगे अहम
भारत में कमजोर मानसून की चिंता, फसल और खाद्य कीमतों पर बढ़ा दबाव






