जमशेदपुर में सड़क हादसे पर उठे गंभीर सवाल: भारी वाहनों की एंट्री और सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान
आज सुबह की शुरुआत एक दुखद खबर से हुई। मेरे पुराने साथी शिशिर गोप, जो झारखंड आंदोलन के समय करीब 30 वर्षों तक ड्राइवर के रूप में मेरे साथ रहे, उनके इकलौते बेटे सागर का कल रात एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया।
मरांग बुरु दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें एवं परिजनों को एक यह दुख सहने की शक्ति दें। आज बर्मामाइंस थाना, टाटा मेन हॉस्पिटल से लेकर एमजीएम हॉस्पिटल के पोस्टमार्टम हाउस एवं पीड़ित परिवार के घर तक, हर पल कई सवाल दिल को कचोटते रहे!
जब जमशेदपुर के नो एंट्री की टाईम तय है, तो फिर उस से पहले भारी वाहन शहर में कैसे घुस जाते हैं? प्रशासन उन्हें क्यों नहीं रोकता? ऐसे ज्यादातर वाहनों में सिर्फ ड्राइवर होते हैं, कोई सहायक/ खलासी क्यों नहीं होता? गाड़ी घुमाते समय चालक को दूसरी तरफ कैसे दिखेगा? यह सुरक्षा के साथ खिलवाड़ नहीं, तो क्या है?
कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता, जब जमशेदपुर के अखबारों में सड़क दुर्घटना की खबरें ना छपती हों। लेकिन इन्हें रोकने के लिए कोई गंभीर प्रयास क्यों नहीं होते? जब ये भारी वाहन टाटा स्टील के लिए ही चल रहे हैं, और दुर्घटना भी कंपनी गेट के 100 मीटर के दायरे में हो रही हैं, तो कंपनी इसकी जिम्मेदारी क्यों नहीं लेती?
जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, जमशेदपुर में सड़क सुरक्षा की बात करना भी बेमानी है।





