नई दिल्ली/कोलकाता, 17 सितंबर 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) का अंदरूनी विवाद अब चुनाव आयोग के सामने पहुंच चुका है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के बीच पार्टी के संगठनात्मक नियंत्रण, अधिकृत पदाधिकारियों, पार्टी के नाम और ‘दो फूल और घास’ चुनाव चिह्न को लेकर दावा-प्रतिदावा चल रहा है। चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को सुनवाई के लिए बुलाया है। चुनाव आयोग ने 17 सितंबर 2026 को दोपहर 3 बजे नई दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन में रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की सुनवाई निर्धारित की थी। यह सुनवाई TMC से संबंधित विभिन्न प्रतिनिधित्वों और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे तथा अधिकृत प्रतिनिधियों को लेकर चल रहे विवाद के संदर्भ में हो रही है। दोनों गुट पहले भी आयोग के समक्ष अपनी दलीलें और दस्तावेज रख चुके हैं। आयोग ने अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने के लिए भी दोनों पक्षों को समय दिया था। विवाद की शुरुआत 22 जून 2026 को हुई, जब रितब्रत बनर्जी ने बागी नेताओं की बैठक बुलाकर TMC की एक नई राष्ट्रीय कार्यसमिति गठित करने का दावा किया। इस समूह ने अरूप राय को राष्ट्रीय कार्यसमिति का अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा की। रितब्रत गुट का दावा है कि पुरानी राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और इसलिए पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में संवैधानिक संकट पैदा हो गया है। इसी आधार पर उसने चुनाव आयोग के समक्ष खुद को पार्टी के वास्तविक संगठनात्मक प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देने की मांग की है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला TMC गुट इस दावे को स्वीकार नहीं करता। पार्टी का कहना है कि उसके संविधान के अनुसार संगठनात्मक समितियों और पदाधिकारियों का कार्यकाल पांच वर्ष का है। TMC ने चुनाव आयोग के सामने पार्टी संविधान के नियम 9(a) का हवाला दिया है। पार्टी के अनुसार, संगठनात्मक चुनाव पांच साल के अंतराल पर होते हैं और 2022 में हुए संगठनात्मक चुनाव के बाद मौजूदा व्यवस्था को अवैध नहीं कहा जा सकता। ममता गुट का यह भी कहना है कि बागी गुट ने संगठन बनाने के लिए पार्टी संविधान में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। पार्टी के अनुसार, संगठनात्मक प्रक्रिया ब्लॉक स्तर से शुरू होकर जिला और राज्य स्तर से गुजरती है और उसके बाद केंद्रीय संगठन का गठन होता है। रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट इसके विपरीत पार्टी संविधान की अलग व्याख्या कर रहा है। उसका कहना है कि फरवरी 2022 में गठित राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल फरवरी 2025 में समाप्त हो गया था। इसी आधार पर बागी गुट ने जून में नई कार्यसमिति बनाने का दावा किया और चुनाव आयोग से संगठनात्मक वैधता के प्रश्न पर फैसला करने की मांग की। रितब्रत गुट का कहना है कि 22 जून की बैठक पार्टी के नियमों के अनुरूप हुई थी। मामला अब केवल संगठनात्मक नियंत्रण तक सीमित नहीं है। दोनों गुट TMC के आधिकारिक नाम और ‘दो फूल और घास’ वाले चुनाव चिह्न पर भी अपना दावा कर रहे हैं। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर 2026 को उपचुनाव होने हैं। दोनों गुटों ने इन सीटों पर उम्मीदवार उतारते हुए TMC के नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने का दावा किया है। नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव के कारण चुनाव चिह्न का सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है। चुनाव कार्यक्रम के मुताबिक मतदान 6 अक्टूबर को और मतगणना 9 अक्टूबर को होनी है। रिपोर्टों के अनुसार, नामांकन प्रक्रिया के दौरान दोनों TMC गुटों ने अपने-अपने उम्मीदवारों को पार्टी उम्मीदवार बताते हुए अधिकृत पत्र पेश किए। ऐसे में चुनाव आयोग के सामने यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि उपचुनाव में पार्टी के नाम और आधिकारिक चुनाव चिह्न का इस्तेमाल किस पक्ष को करने दिया जाएगा। जुलाई में रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अपना दावा पेश किया था। उस समय गुट ने दावा किया था कि उसे TMC के बड़ी संख्या में विधायकों, पार्षदों और जिला परिषद सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। इसके जवाब में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले TMC ने चुनाव आयोग के सामने अपने संगठनात्मक रिकॉर्ड और पार्टी संविधान से संबंधित दस्तावेज रखे। पार्टी ने बागी गुट के दावों को चुनौती देते हुए कहा कि संगठनात्मक चुनाव निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हुए हैं। सितंबर की सुनवाई से पहले रितब्रत गुट ने अलीपुर अदालत के जुलाई 2026 के एक अंतरिम आदेश का भी हवाला दिया था। रिपोर्टों के मुताबिक, उस आदेश का संबंध TMC के पार्टी कार्यालयों, बैंक खातों और संपत्तियों के नियंत्रण से जुड़े दावों से था। हालांकि, ममता बनर्जी गुट ने इस आधार को स्वीकार नहीं किया और पार्टी संविधान तथा संगठनात्मक चुनावों से जुड़े अपने दस्तावेज आयोग के सामने रखे हैं। मौजूदा विवाद में आयोग को मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर विचार करना है: इन सवालों पर आयोग द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों, पार्टी संविधान और दोनों पक्षों के दावों की जांच की जा रही है। अभी अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। चुनाव आयोग की सुनवाई का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव नजदीक हैं। आयोग के निर्णय का असर उम्मीदवारों द्वारा पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर पड़ सकता है। फिलहाल किसी भी गुट को चुनाव आयोग द्वारा अंतिम रूप से TMC का वैध संगठन घोषित किए जाने की पुष्टि नहीं हुई है। आयोग दोनों पक्षों के दस्तावेज और दावों की जांच कर रहा है। कुल मिलाकर, TMC का विवाद अब आंतरिक राजनीतिक मतभेद से आगे बढ़कर चुनावी और संगठनात्मक मान्यता के प्रश्न में बदल गया है। आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की कार्यवाही और नंदीग्राम-रेजीनगर उपचुनाव से जुड़े फैसले इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।17 सितंबर को चुनाव आयोग में अहम सुनवाई
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
ममता गुट की क्या दलील है?
रितब्रत गुट का दावा क्या है?
चुनाव चिह्न पर क्यों बढ़ा विवाद?
उपचुनाव ने बढ़ाई चुनाव आयोग की भूमिका
पहले भी आयोग के सामने पहुंच चुके हैं दोनों पक्ष
जुलाई के अदालत आदेश का भी संदर्भ
अब चुनाव आयोग के सामने मुख्य सवाल
आगे क्या हो सकता है?
TMC के अंदरूनी विवाद पर चुनाव आयोग में सुनवाई, पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर दोनों गुट आमने-सामने






