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मंत्री सुदिव्य सोनू का देवघर से था दिल का रिश्ता


मंत्री सुदिव्य 'सोनू' का देवघर से था दिल का रिश्ता


• उनके निधन से बाबानगरी हुई मर्माहत


अमित कुमार,
रांची एक्सप्रेस ब्यूरो 

देवघर : झारखंड सरकार के नगर विकास, पर्यटन, कला-संस्कृति मंत्री *सुदिव्य कुमार 'सोनू'* के आकस्मिक निधन की खबर ने पूरे झारखंड के साथ-साथ देवघर को भी गहरे शोक में डुबो दिया है। पड़ोसी जिला गिरिडीह के निवासी होने के कारण देवघर से उनका लगाव सिर्फ एक मंत्री का अपने प्रभार वाले जिले से नहीं, बल्कि एक पड़ोसी, एक भाई और एक सच्चे शिव भक्त का था।

देवघर उनके लिए सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि आस्था का केंद्र था। पर्यटन मंत्री रहते हुए उनकी सबसे ज्यादा नजर अगर किसी आयोजन पर रहती थी, तो वह था- *"विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला।"*

श्रावणी मेले को लेकर वे हमेशा गंभीर रहते थे। हर बैठक में उनका एक ही निर्देश होता था - "कांवरियों को कोई कष्ट नहीं होना चाहिए। बाबा के भक्तों के लिए देवघर में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।" मेला शुरू होने से महीनों पहले से ही वे तैयारियों की समीक्षा करने लगते थे। सड़कों की मरम्मती, पेयजल, शौचालय, स्वास्थ्य शिविर, सुरक्षा और साफ-सफाई को लेकर वे खुद अधिकारियों से बात करते थे। पिछले श्रावणी मेले के दौरान वे कई बार बिना प्रोटोकॉल के देवघर पहुंचे और कांवड़िया पथ पर पैदल चलकर व्यवस्थाओं का जायजा लिया था। कई दुकानदारों और पुरोहितों से उन्होंने आत्मीयता से बात की थी।

उनका मानना था कि देवघर सिर्फ झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की आध्यात्मिक राजधानी है। वे अक्सर कहते थे कि बाबा बैद्यनाथ धाम को विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल बनाना उनका सपना है। इसके लिए उन्होंने पर्यटन विभाग में कई योजनाओं को स्वीकृति दिलाई थी। बासुकीनाथ धाम के विकास, शिवगंगा के सौंदर्यीकरण और देवघर में पर्यटन कॉरिडोर की उनकी परिकल्पना आज अधूरी रह गई।

गिरिडीह का होने के कारण देवघर के लोगों से उनका एक अलग ही जुड़ाव था। देवघर आने पर वे प्रोटोकॉल से ज्यादा अपनों से मिलने को प्राथमिकता देते थे। यहाँ के कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, समाजसेवियों और आम लोगों के बीच वे बेहद लोकप्रिय थे। उनका स्वभाव इतना सरल और सहज था कि कोई भी व्यक्ति आसानी से उनसे मिल सकता था। चेहरे पर हमेशा मुस्कान और सबको 'भैया' कहकर संबोधित करने का उनका अंदाज ही उन्हें सबसे अलग बनाता था।

देवघर के लोग बताते हैं कि जब भी वे देवघर आते, तो बाबा मंदिर में पूजा करने जरूर जाते थे। वे कहते थे - "मैं जब भी बाबा के दरबार में आता हूँ, मुझे नई ऊर्जा मिलती है।" शायद बाबा से यही गहरा नाता था कि उनके निधन की खबर सुनते ही देवघर वासियों की आंखें नम हो गईं।

उच्च शिक्षा मंत्री के रूप में भी देवघर के लिए उनकी सोच बड़ी थी। वे चाहते थे कि देवघर में शिक्षा के बेहतर अवसर बढ़ें, ताकि संताल परगना के युवाओं को बाहर न जाना पड़े।

आज देवघर की सड़कों पर, चाय-पान की दुकानों पर, और मंदिर के आसपास बस एक ही चर्चा है - *"इतना सरल, इतना मिलनसार नेता इतनी जल्दी चला गया।"* उनका असमय जाना न सिर्फ *झामुमो*, बल्कि संथाल परगना प्रमंडल समेत पूरे झारखंड के लिए अपूरणीय क्षति है। बाबा बैद्यनाथ धाम की नगरी ने अपना एक सच्चा हितैषी खो दिया है।