आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की बढ़ती कंप्यूटिंग जरूरतों के बीच Google अब अंतरिक्ष को भी कंप्यूटिंग के संभावित ठिकाने के रूप में तलाश रहा है। कंपनी अपने Project Suncatcher के तहत एक प्रोटोटाइप सैटेलाइट को लो अर्थ ऑर्बिट में भेजने की तैयारी कर रही है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि Google के AI प्रोसेसर यानी Tensor Processing Units (TPUs) अंतरिक्ष के कठोर वातावरण में किस तरह काम करते हैं। Google के मुताबिक, जमीन पर TPUs को लेकर कई परीक्षण पहले ही किए जा चुके हैं। लेकिन अंतरिक्ष का वातावरण अलग होता है। रॉकेट लॉन्च के दौरान तेज कंपन और अत्यधिक त्वरण, कक्षा में रेडिएशन तथा तापमान में बड़े बदलाव जैसी परिस्थितियां इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए चुनौती पैदा करती हैं। इसी वजह से अब कंपनी वास्तविक अंतरिक्ष वातावरण में अपने AI हार्डवेयर की क्षमता जांचना चाहती है। प्रस्तावित मिशन में सैटेलाइट को SpaceX के Transporter-18 rideshare मिशन के जरिए कक्षा में भेजने की योजना है और इसमें Planet के साथ साझेदारी की गई है। Project Suncatcher Google का एक दीर्घकालिक शोध कार्यक्रम है। इसका विचार यह जांचना है कि भविष्य में सौर ऊर्जा से चलने वाले सैटेलाइटों के नेटवर्क में AI कंप्यूटिंग हार्डवेयर लगाया जा सकता है या नहीं। Google की परिकल्पना के अनुसार, लो अर्थ ऑर्बिट में मौजूद सैटेलाइटों को आपस में जोड़कर एक ऐसा नेटवर्क बनाया जा सकता है, जिसमें बड़ी मात्रा में मशीन-लर्निंग कंप्यूटिंग क्षमता उपलब्ध हो। कंपनी ने इसके लिए TPUs और हाई-बैंडविड्थ ऑप्टिकल यानी लेजर संचार तकनीक के इस्तेमाल की अवधारणा पेश की है। AI मॉडल को ट्रेन करने और चलाने के लिए लगातार बढ़ती कंप्यूटिंग क्षमता और बिजली की जरूरत होती है। धरती पर बड़े डेटा सेंटरों के लिए बिजली, जमीन, नेटवर्किंग और कूलिंग जैसी सुविधाओं की जरूरत होती है। Google का शोध इस संभावना पर आधारित है कि अंतरिक्ष में सौर पैनलों को सूर्य की रोशनी लगभग लगातार मिल सकती है। कंपनी के अनुसार, कुछ कक्षाओं में सौर पैनल पृथ्वी की तुलना में कई गुना अधिक प्रभावी ढंग से ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं। इसी संभावना को भविष्य की AI कंप्यूटिंग जरूरतों से जोड़कर Project Suncatcher विकसित किया जा रहा है। अंतरिक्ष में AI चिप चलाना केवल बिजली उपलब्ध कराने का मामला नहीं है। AI प्रोसेसर बड़ी मात्रा में गर्मी पैदा करते हैं और उन्हें लगातार ठंडा रखना जरूरी होता है। धरती पर कंप्यूटर और डेटा सेंटरों में हवा या तरल आधारित कूलिंग सिस्टम इस्तेमाल किए जा सकते हैं। लेकिन अंतरिक्ष के निर्वात में सामान्य एयर-कूलिंग काम नहीं करती। इसलिए Google हीट पाइप और रेडिएटर जैसी तकनीकों का परीक्षण कर रहा है, ताकि चिप से पैदा होने वाली गर्मी को अंतरिक्ष में विकिरित किया जा सके। पृथ्वी का वातावरण और चुंबकीय क्षेत्र इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को अंतरिक्षीय विकिरण से काफी हद तक बचाते हैं। लेकिन कक्षा में इलेक्ट्रॉनिक्स को ज्यादा रेडिएशन का सामना करना पड़ता है। Google ने जमीन पर TPUs को प्रोटॉन बीम परीक्षणों से गुजारकर यह देखने की कोशिश की कि रेडिएशन से होने वाली संभावित त्रुटियां AI कंप्यूटिंग को किस तरह प्रभावित कर सकती हैं। कंपनी के मुताबिक शुरुआती परीक्षणों में उसके Trillium TPUs ने अपेक्षाकृत मजबूत प्रदर्शन दिखाया, लेकिन वास्तविक कक्षा में परीक्षण से अतिरिक्त जानकारी मिलेगी। Google की दीर्घकालिक योजना केवल एक सैटेलाइट तक सीमित नहीं है। कंपनी भविष्य में कई सैटेलाइटों को एक नेटवर्क के रूप में जोड़ने की संभावना तलाश रही है। इसके लिए लेजर आधारित हाई-बैंडविड्थ कम्युनिकेशन महत्वपूर्ण होगा। सैटेलाइटों को एक-दूसरे के साथ तेजी से डेटा साझा करना होगा, ताकि अलग-अलग कक्षीय कंप्यूटिंग इकाइयां मिलकर बड़े AI कार्यों को संभाल सकें। Google ने 2027 में दो सैटेलाइटों के जरिए इस तरह की कनेक्टिविटी का परीक्षण करने की योजना बताई है। Project Suncatcher को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मौजूदा मिशन का उद्देश्य अंतरिक्ष में तैयार डेटा सेंटर स्थापित करना नहीं, बल्कि तकनीकी व्यवहार्यता की जांच करना है। पहला परीक्षण यह समझने के लिए किया जा रहा है कि लॉन्च, रेडिएशन, तापमान, कूलिंग और अन्य परिस्थितियों में Google का AI हार्डवेयर कैसे प्रदर्शन करता है। इस मिशन से मिलने वाले आंकड़ों का इस्तेमाल आगे के डिजाइन और प्रयोगों में किया जाएगा। Google अकेली कंपनी नहीं है जो अंतरिक्ष में कंप्यूटिंग की संभावना तलाश रही है। SpaceX और Starcloud जैसी कंपनियां भी लो अर्थ ऑर्बिट में डेटा सेंटर या AI कंप्यूटिंग से जुड़ी अवधारणाओं पर काम कर रही हैं। इसका एक कारण AI की तेजी से बढ़ती कंप्यूटिंग मांग है। हालांकि अंतरिक्ष में बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर बनाना अभी महंगा और तकनीकी रूप से जटिल काम है। लॉन्च लागत, हार्डवेयर की विश्वसनीयता, कूलिंग, संचार और सैटेलाइट निर्माण जैसी कई समस्याओं का समाधान करना बाकी है। पहले परीक्षण से मिलने वाले नतीजे यह तय करने में मदद करेंगे कि Project Suncatcher को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाए। यदि हार्डवेयर, कूलिंग और संचार तकनीकों के परीक्षण सफल रहते हैं, तो भविष्य में अधिक सैटेलाइटों वाले प्रयोग किए जा सकते हैं। Google ने स्पष्ट किया है कि यह एक लंबी अवधि का शोध प्रयास है। यानी अंतरिक्ष में बड़े पैमाने पर AI कंप्यूटिंग शुरू होने में अभी कई तकनीकी और आर्थिक चरण पार करने होंगे। Google का Project Suncatcher AI कंप्यूटिंग के लिए एक बिल्कुल अलग दिशा की खोज है। कंपनी अब यह जांच रही है कि क्या भविष्य में सौर ऊर्जा से संचालित सैटेलाइटों और AI चिप्स के नेटवर्क के जरिए अंतरिक्ष में बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग संभव हो सकती है। पहला ऑर्बिटल परीक्षण इसी बड़े विचार की शुरुआती तकनीकी परीक्षा है—न कि अभी तैयार अंतरिक्ष डेटा सेंटर।पहली बार कक्षा में होगी AI चिप की वास्तविक परीक्षा
Project Suncatcher क्या है?
अंतरिक्ष में ही AI कंप्यूटिंग की जरूरत क्यों?
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती है चिप को ठंडा रखना
रेडिएशन भी बड़ी चुनौती
भविष्य में सैटेलाइट आपस में कैसे जुड़ेंगे?
अभी यह व्यावसायिक डेटा सेंटर नहीं
AI और अंतरिक्ष के बीच बढ़ती दौड़
आगे की राह
निष्कर्ष
Google का अंतरिक्ष में AI चिप परीक्षण, Project Suncatcher से शुरू होगा नया प्रयोग






