पटना: बिहार की राजधानी पटना में साइबर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है। यहां पथ निर्माण विभाग के एक सेवानिवृत्त सहायक अभियंता को कथित घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में फंसाने की धमकी देकर साइबर अपराधियों ने करीब तीन दिनों तक मानसिक दबाव में रखा। खुद को मुंबई पुलिस और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) का अधिकारी बताने वाले आरोपियों ने जांच के नाम पर पीड़ित से कुल 33.83 लाख रुपये से अधिक ट्रांसफर करा लिए। पीड़ित ने साइबर पुलिस और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, घटना की शुरुआत 27 सितंबर को एक अनजान नंबर से आए व्हाट्सऐप कॉल से हुई। कॉल करने वाले ने दावा किया कि मुंबई में पीड़ित के नाम पर फर्जी सिम कार्ड जारी हुआ है और उसका इस्तेमाल संदिग्ध गतिविधियों में किया गया है। इसके बाद पीड़ित को कथित तौर पर मुंबई क्राइम ब्रांच और फिर एक ऐसे व्यक्ति से बात कराई गई, जिसने खुद को सीबीआई का वरिष्ठ अधिकारी बताया। उसने सेवानिवृत्त इंजीनियर का नाम 500 करोड़ रुपये के कथित घोटाले से जोड़ते हुए गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया। आरोपियों ने दावा किया कि जांच में पीड़ित के पहचान दस्तावेजों और बैंक खातों का संबंध संदिग्ध लेन-देन से मिला है। इन दावों का उद्देश्य पीड़ित को भयभीत कर उनकी बात मानने के लिए मजबूर करना था। ठगी के इस तरीके को आम तौर पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ कहा जाता है। इसमें अपराधी खुद को पुलिस या किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को गिरफ्तारी, पूछताछ अथवा कानूनी कार्रवाई का डर दिखाते हैं। फिर उन्हें लगातार फोन या वीडियो कॉल पर रहने और परिवार या अन्य लोगों से संपर्क न करने के लिए दबाव डालते हैं। इस मामले में भी आरोप है कि पीड़ित को तीन दिनों तक लगातार संपर्क में रखा गया। उनका भरोसा जीतने के लिए कथित तौर पर पुलिस की वर्दी वाली तस्वीरें, पहचान पत्र और कानूनी दस्तावेज जैसे दिखने वाले कागजात भी भेजे गए। रात में भी फोन पर बने रहने और मोबाइल चार्ज रखने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, आरोपियों ने बैंक खातों के सत्यापन के बहाने पीड़ित से दो अलग-अलग खातों में रुपये भेजने को कहा। पहली बार इंडियन बैंक के खाते से RTGS के जरिए लगभग 22.86 लाख रुपये और दूसरी बार भारतीय स्टेट बैंक के खाते से करीब 10.97 लाख रुपये ट्रांसफर कराए गए। इस तरह कुल रकम लगभग 33.83 लाख रुपये तक पहुंच गई। ठगों ने कथित तौर पर भरोसा दिलाया था कि जांच पूरी होने के दो-तीन दिनों के भीतर पैसे वापस कर दिए जाएंगे। लेकिन तय समय बीतने के बाद भी रकम वापस नहीं आई और आरोपियों से संपर्क टूटने लगा। इसके बाद पीड़ित को ठगी का एहसास हुआ। ठगी का पता चलने के बाद पीड़ित ने संबंधित साइबर पुलिस थाने और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत की। मामले में कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और रकम के लेन-देन की जांच अहम होगी। पुलिस की जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि ठगी में कितने लोग शामिल थे और रकम किन खातों में पहुंची। फोन पर खुद को पुलिस, CBI या किसी अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताने वाले व्यक्ति के दबाव में आकर पैसे ट्रांसफर न करें। किसी भी कथित जांच के नाम पर OTP, PIN, पासवर्ड या बैंकिंग जानकारी साझा न करें। संदिग्ध कॉल आने पर परिवार के किसी सदस्य से बात करें और संबंधित एजेंसी से स्वतंत्र रूप से आधिकारिक संपर्क माध्यम के जरिए पुष्टि करें। यदि साइबर ठगी हो जाए, तो तुरंत 1930 पर कॉल करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें। जल्द शिकायत करने से रकम रोकने की संभावना बढ़ सकती है। पटना का यह मामला दिखाता है कि साइबर अपराधी सरकारी एजेंसियों के नाम और कानूनी कार्रवाई के डर का इस्तेमाल करके लोगों को निशाना बना रहे हैं। याद रखें, फोन या वीडियो कॉल पर कोई व्यक्ति आपको कानूनी रूप से ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं कर सकता। किसी भी संदिग्ध कॉल पर घबराने के बजाय उसकी आधिकारिक पुष्टि करना और तुरंत मदद लेना जरूरी है।फर्जी सिम कार्ड और 500 करोड़ के घोटाले का डर दिखाया
तीन दिन तक फोन पर बनाए रखा दबाव
जांच के नाम पर दो बैंक खातों से रकम ट्रांसफर
साइबर पुलिस के सामने शिकायत, जांच जारी
ऐसे साइबर अपराध से कैसे बचें?
निष्कर्ष
पटना में रिटायर्ड इंजीनियर को डिजिटल अरेस्ट का डर, तीन दिनों में 33.83 लाख रुपये ठगे






