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वर्दी का सम्मान, जनता का अधिकार और कानून का राज


सोशल मीडिया के दौर में पुलिस और जनता—दोनों को आत्ममंथन की आवश्यकता

पंचम कुमार

छतरपुर :   आज के डिजिटल युग में मोबाइल फोन केवल बातचीत का साधन नहीं, बल्कि समाज का आईना बन चुका है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों से प्रतिदिन ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं जिनमें कहीं पुलिसकर्मी आम लोगों के साथ मारपीट करते दिखाई देते हैं, कहीं गाली-गलौज करते, कहीं महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार करते, तो कहीं वाहन जांच के दौरान कथित वसूली या अनावश्यक बल प्रयोग करते हुए नजर आते हैं। दूसरी ओर ऐसे भी वीडियो सामने आते हैं जिनमें कुछ लोग पुलिस के साथ अभद्रता करते हैं, सरकारी कार्य में बाधा डालते हैं, भीड़ इकट्ठी कर माहौल बिगाड़ते हैं या कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करते हैं।
ऐसे दृश्य केवल किसी एक व्यक्ति या विभाग की छवि खराब नहीं करते, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर समाज किस दिशा में जा रहा है? क्या पुलिस अपने कर्तव्य और संवैधानिक मर्यादा को भूल रही है, या जनता अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी नजरअंदाज कर रही है? सच यह है कि यदि दोनों पक्ष अपने-अपने दायित्वों का ईमानदारी से पालन करें, तो ऐसी अधिकांश घटनाओं से बचा जा सकता है।
पुलिस का कार्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना, अपराध रोकना और नागरिकों की सुरक्षा करना है। कानून पुलिस को आवश्यक परिस्थितियों में बल प्रयोग का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। बल प्रयोग केवल उतना ही होना चाहिए जितना कानून और परिस्थिति की आवश्यकता हो। किसी व्यक्ति के साथ अपमानजनक व्यवहार करना, अनावश्यक मारपीट करना, गाली देना या कानून से परे जाकर कार्रवाई करना किसी भी पुलिसकर्मी का अधिकार नहीं है। वर्दी शक्ति का प्रतीक है, लेकिन उससे भी बड़ा प्रतीक जिम्मेदारी और अनुशासन है।
दूसरी ओर नागरिकों का भी कर्तव्य है कि वे पुलिस जांच में सहयोग करें, वैध दस्तावेज प्रस्तुत करें, कानून का पालन करें और सरकारी कार्य में बाधा न डालें। पुलिस से असहमति होने पर उसका समाधान कानून के माध्यम से किया जाना चाहिए, न कि हिंसा या टकराव से।
आज एक और महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि क्या कोई नागरिक पुलिस की कार्रवाई का वीडियो बना सकता है? सामान्य परिस्थितियों में यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर हो रही पुलिस कार्रवाई का शांतिपूर्वक वीडियो बनाता है और उससे सरकारी कार्य में बाधा नहीं पहुंचती, तो केवल वीडियो बनाना अपने आप में अपराध नहीं माना जाता। लेकिन यदि कोई व्यक्ति पुलिस की कार्रवाई में हस्तक्षेप करे, साक्ष्य से छेड़छाड़ करे या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने का प्रयास करे, तो उसके विरुद्ध कार्रवाई हो सकती है। इसलिए वीडियो बनाना और सरकारी कार्य में बाधा डालना - दो अलग-अलग बातें हैं।
फिर भी अक्सर देखने में आता है कि कुछ पुलिसकर्मी कैमरा देखकर उत्तेजित हो जाते हैं, मोबाइल छीनने की कोशिश करते हैं या वीडियो बनाने वाले को धमकाते हैं। यदि पुलिस कानून के दायरे में रहकर कार्य कर रही है, तो पारदर्शिता से डरने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। वहीं नागरिकों को भी वीडियो को तोड़-मरोड़कर या भ्रामक जानकारी के साथ प्रसारित करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे निर्दोष लोगों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर भरत भूषण तिवारी से जुड़ी घटनाओं और चर्चाओं ने भी यही बहस तेज कर दी है कि क्या सही है और क्या गलत। इस मामले के विभिन्न पहलुओं पर सोशल मीडिया में अनेक दावे और प्रतिदावे किए जा रहे हैं। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जांच और प्रमाणिक तथ्यों का इंतजार करना ही लोकतांत्रिक और जिम्मेदार नागरिक होने की पहचान है। भावनाओं में बहकर किसी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करना न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
यह भी सच है कि ऐसे मामलों ने हजारों युवाओं के भीतर अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा की है। लेकिन अधिकारों के साथ कर्तव्यों की समझ भी उतनी ही आवश्यक है। लोकतंत्र की मजबूती टकराव से नहीं, बल्कि कानून के सम्मान और पारदर्शिता से होती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पुलिस को संवेदनशील, जवाबदेह और जनहितैषी बनाया जाए। पुलिस प्रशिक्षण में व्यवहारिक कौशल, मानवाधिकार और संवाद क्षमता पर अधिक बल दिया जाए। साथ ही नागरिकों को भी यातायात नियमों, कानूनी प्रक्रियाओं और अपने संवैधानिक अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूक किया जाए।
याद रखिए - लोकतंत्र में न जनता कानून से ऊपर है और न ही पुलिस। कानून सबसे ऊपर है। वर्दी का सम्मान तभी बना रहेगा जब उसमें विनम्रता होगी, और नागरिकों के अधिकार तभी सुरक्षित रहेंगे जब वे अपने कर्तव्यों का भी पूरी निष्ठा से पालन करेंगे।
जब पुलिस अपने अधिकारों की सीमा समझेगी और जनता अपने कर्तव्यों का महत्व, तभी एक ऐसा समाज बनेगा जहाँ न वर्दी से डर होगा, न कानून से अविश्वास - बल्कि दोनों के बीच विश्वास, सम्मान और न्याय का रिश्ता होगा।