बदलते रहे सांसद, विधायक और पदाधिकारी, लेकिन मूलभूत सुविधाओं की तस्वीर अब भी जस की तस
पंचम कुमार
छतरपुर, (पलामू): पलामू जिले का छतरपुर अनुमंडल अपनी स्थापना के 32 वर्ष पूरे हुए। लेकिन तीन दशक से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी अनुमंडल क्षेत्र की कई मूलभूत जरूरतें आज तक पूरी नहीं हो सकी हैं। समय के साथ जनप्रतिनिधि बदले, अधिकारी बदले, सरकारें बदलीं और विकास के दावे भी हुए, लेकिन आम जनता की कई बुनियादी समस्याएं आज भी उसी मोड़ पर खड़ी हैं।
छतरपुर अनुमंडल का विधिवत उद्घाटन 16 सितंबर 1994 को तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के कर-कमलों द्वारा तथा तत्कालीन राज्यमंत्री लक्ष्मण राम की विशिष्ट उपस्थिति में किया गया था। उद्घाटन से संबंधित शिलापट्ट आज भी छतरपुर में मौजूद है। उस समय जिस अनुमंडल से बेहतर प्रशासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, बाजार और नागरिक सुविधाओं की उम्मीद जगी थी, वह उम्मीद तीन दशक बाद भी पूरी तरह धरातल पर उतरती दिखाई नहीं देती।
चार प्रखंडों का अनुमंडल, सुविधाओं की अब भी कमी
छतरपुर अनुमंडल के अंतर्गत आने वाले चार प्रखंडों (छतरपुर , हरिहरगंज, पिपरा और नौडीहा बाजार) की बड़ी आबादी आज भी कई जरूरी कार्यों और गंभीर उपचार के लिए अनुमंडल से बाहर जाने को मजबूर है। सामान्य नागरिक सुविधाओं से लेकर स्वास्थ्य, बाजार, परिवहन और प्रशासनिक सेवाओं तक कई क्षेत्रों में अब भी अपेक्षित विकास की जरूरत है।
छतरपुर शहर में अनुमंडल कार्यालय, प्रखंड, अंचल, नगर पंचायत, थाना, अस्पताल और शिक्षा विभाग जैसे महत्वपूर्ण सरकारी संस्थान मुख्य मार्ग के आसपास मौजूद हैं। इसके बावजूद शहर की मुख्य सड़क की स्थिति और यातायात व्यवस्था कई सवाल खड़े करती है।
बाईपास से राहत मिली, लेकिन शहर का जाम अब भी चुनौती
छतरपुर में बाईपास सड़क का निर्माण निश्चित रूप से शहरवासियों और राहगीरों के लिए राहत लेकर आया है। भारी वाहनों के आवागमन में इससे काफी हद तक सुविधा मिली है और अनेक लोगों को इसका प्रत्यक्ष लाभ भी मिला है। बावजूद इसके शहर के मुख्य हिस्से में जाम की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी है।
मंगलवार को लगने वाले साप्ताहिक बाजार के दिन स्थिति और गंभीर हो जाती है। वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार सड़क के आसपास ही दुकानें लगती हैं। शहर में व्यवस्थित और पर्याप्त बड़े बाजार स्थल का अभाव होने के कारण दुकानदारों और ग्राहकों दोनों को सड़क किनारे ही निर्भर रहना पड़ता है। इसका सीधा असर यातायात और आम नागरिकों की आवाजाही पर पड़ता है।
सवाल यह है कि जब छतरपुर अनुमंडल मुख्यालय है, तो क्या यहां व्यवस्थित बाजार, पर्याप्त पार्किंग, वाहन पड़ाव और बेहतर यातायात व्यवस्था विकसित नहीं की जा सकती?
शिक्षा विभाग के सामने विद्यालय का यह हाल क्यों?
छतरपुर प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी के कार्यालय के सामने स्थित राजकीय मध्य विद्यालय की स्थिति भी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। विद्यालय परिसर और उसके आसपास कचरे का अंबार, मूत्रालय जैसी स्थिति तथा छोटे वाहनों का पड़ाव दिखाई देना शिक्षा व्यवस्था के साथ-साथ स्वच्छता और प्रशासनिक निगरानी पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
जिस शहर के बीचों-बीच और शिक्षा विभाग के कार्यालय के सामने स्थित एक प्रमुख सरकारी विद्यालय की स्थिति ऐसी हो, वहां सहज सवाल उठता है कि दूर-दराज के विद्यालयों की निगरानी और व्यवस्था किस स्तर की होगी?
विद्यालय केवल भवन नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य का केंद्र होता है। इसलिए विद्यालय परिसर को स्वच्छ, सुरक्षित और अतिक्रमण एवं अनधिकृत वाहन पड़ाव से मुक्त रखना संबंधित विभाग और स्थानीय प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
अनुमंडलीय अस्पताल है, लेकिन गंभीर मरीजों को बाहर जाना पड़ता है
स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति छतरपुर अनुमंडल के लिए सबसे गंभीर विषयों में से एक है। शहर के मुख्य स्थान पर अनुमंडलीय अस्पताल होने के बावजूद आज भी कई ऐसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जिनकी जरूरत गंभीर मरीजों को तत्काल पड़ती है।
डॉक्टरों की नियुक्ति के बावजूद उनकी नियमित उपलब्धता को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। अस्पताल में कई व्यवस्थाएं आउटसोर्सिंग कर्मियों के सहारे संचालित होने की स्थिति में हैं। वहीं ब्लड बैंक और ट्रॉमा सेंटर जैसी महत्वपूर्ण सुविधाओं का अभाव गंभीर दुर्घटनाओं और आपातकालीन मरीजों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल व्यक्ति के लिए शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में यदि मरीज को तत्काल बेहतर उपचार के लिए मेदिनीनगर या रांची रेफर करना पड़े, तो रास्ते का समय उसके जीवन पर भारी पड़ सकता है।
आज भी गंभीर बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में लोगों को जिला मुख्यालय अथवा रांची की ओर रुख करना पड़ता है। आखिर 32 वर्ष पुराने अनुमंडल मुख्यालय में ऐसी स्वास्थ्य सुविधाएं कब विकसित होंगी, जिनसे लोगों को हर गंभीर बीमारी के लिए बाहर न जाना पड़े?
पोस्टमार्टम हाउस का अभाव भी गंभीर समस्या
छतरपुर अनुमंडल क्षेत्र में पोस्टमार्टम हाउस की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण दुर्घटना, संदिग्ध मृत्यु अथवा अन्य मामलों में मृतकों के परिजनों को अतिरिक्त परेशानी उठानी पड़ती है। शव को पोस्टमार्टम के लिए दूसरे स्थान पर ले जाना पड़ता है, जिससे समय, खर्च और मानसिक परेशानी बढ़ती है।
ऐसे संवेदनशील मामलों में स्थानीय स्तर पर आवश्यक सुविधा उपलब्ध होना न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पीड़ित परिवारों के लिए भी बड़ी राहत होगी।
निबंधन के लिए भी अनुमंडल से बाहर क्यों?
छतरपुर अनुमंडल क्षेत्र के लोगों के लिए एक और बड़ा सवाल भूमि एवं संपत्ति निबंधन से जुड़ा है। आज भी निबंधन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए लोगों को हुसैनाबाद या मेदिनीनगर जाना पड़ता है।
जब छतरपुर तीन दशक से अधिक समय से अनुमंडल मुख्यालय है और यहां बड़ी आबादी प्रशासनिक सेवाओं पर निर्भर है, तो निबंधन कार्यालय की सुविधा स्थानीय स्तर पर क्यों नहीं उपलब्ध हो सकी?
एक सामान्य नागरिक को छोटे-छोटे सरकारी कार्यों के लिए दूसरे शहर या अनुमंडल तक जाना पड़े, तो इससे समय, पैसा और श्रम—तीनों की बर्बादी होती है।
वाहन चालान जमा कराने की व्यवस्था भी हो स्थानीय स्तर पर
छतरपुर अनुमंडल मुख्यालय में वाहन चालान जमा कराने जैसी आवश्यक नागरिक सुविधा के लिए भी लोगों को बाहर जाने की परेशानी उठानी पड़ती है। यदि स्थानीय स्तर पर चालान भुगतान की सुविधा उपलब्ध हो, तो वाहन मालिकों को समय और अनावश्यक यात्रा खर्च से राहत मिलेगी।
डिजिटल भुगतान के बढ़ते दौर में ऐसी सुविधाओं को नागरिकों के लिए अधिक सुलभ बनाना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
बस स्टैंड और पार्किंग की सुविधा का इंतजार
छतरपुर शहर में व्यवस्थित बस स्टैंड का निर्माण लंबे समय से एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बना हुआ है। वर्तमान में बसों और छोटे यात्री वाहनों के ठहराव की व्यवस्था को लेकर लोगों को परेशानी होती है। सड़क किनारे वाहनों के रुकने से यातायात प्रभावित होता है और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठते हैं।
शहर में पर्याप्त पार्किंग और वाहन पड़ाव की व्यवस्था नहीं होने से जाम की समस्या और बढ़ जाती है। इसलिए बस स्टैंड, ऑटो एवं छोटे यात्री वाहनों के लिए अलग पड़ाव तथा व्यवस्थित पार्किंग की सुविधा विकसित करना जरूरी है।
टाउन हॉल और पार्क जैसी नागरिक सुविधाएं भी जरूरी
छतरपुर अनुमंडल मुख्यालय में टाउन हॉल जैसी सुविधा का अभाव भी महसूस किया जाता है। सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्यक्रमों के लिए एक व्यवस्थित सभागार होने से शहर की गतिविधियों को बेहतर मंच मिल सकता है।
इसी प्रकार शहर में सार्वजनिक पार्क और मनोरंजन स्थल की सुविधा भी जरूरी है। बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों के लिए सुरक्षित एवं स्वच्छ पार्क न केवल मनोरंजन का साधन होंगे, बल्कि शहर के वातावरण को भी बेहतर बनाएंगे।
छोटे उद्योग-धंधों की स्थापना से रोजगार को मिलेगा बढ़ावा
छतरपुर अनुमंडल की बड़ी आबादी रोजगार के लिए दूसरे शहरों और राज्यों पर निर्भर है। स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योग-धंधों, कुटीर उद्योगों, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि आधारित व्यवसाय तथा अन्य रोजगारपरक इकाइयों की स्थापना से युवाओं को अपने क्षेत्र में ही काम के अवसर मिल सकते हैं।
इसके लिए प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को उद्योग विभाग के माध्यम से संभावनाओं का सर्वे कराना चाहिए। स्थानीय संसाधनों, कृषि उत्पादों और युवाओं की क्षमता के आधार पर छोटे उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है।
सवाल किसी व्यक्ति से नहीं, व्यवस्था से है
छतरपुर की समस्याओं को किसी एक सांसद, विधायक या अधिकारी के खाते में डालना उचित नहीं होगा। क्योंकि पिछले 32 वर्षों में अनेक जनप्रतिनिधि आए और गए तथा प्रशासनिक अधिकारियों का भी लगातार स्थानांतरण होता रहा। लेकिन जनता का सवाल इससे कहीं बड़ा है।
क्या किसी क्षेत्र का विकास केवल प्रतिनिधि और अधिकारी बदलने से होता है, या फिर उसके लिए दीर्घकालिक योजना, स्पष्ट प्राथमिकता और लगातार निगरानी की जरूरत होती है?
छतरपुर को अब घोषणाओं से अधिक स्थायी समाधान की जरूरत है।
अब चाहिए स्पष्ट रोडमैप
छतरपुर अनुमंडल की जनता को स्वास्थ्य के क्षेत्र में ब्लड बैंक, ट्रॉमा सेंटर, पर्याप्त डॉक्टर एवं जांच सुविधाएं चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में विद्यालयों की बेहतर व्यवस्था, स्वच्छ परिसर और नियमित निगरानी चाहिए। शहर को व्यवस्थित बाजार, वाहन पड़ाव, पार्किंग और स्थायी यातायात समाधान चाहिए।
इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर निबंधन कार्यालय, वाहन चालान जमा कराने की सुविधा, बस स्टैंड, टाउन हॉल, पार्क, पोस्टमार्टम हाउस और छोटे उद्योग-धंधों की स्थापना जैसी जरूरतों पर भी ठोस पहल होनी चाहिए।
बाईपास जैसी विकास योजनाएं यह साबित करती हैं कि इच्छाशक्ति और योजना के साथ बदलाव संभव है। अब जरूरत है कि इसी सोच को स्वास्थ्य, शिक्षा, बाजार, यातायात और प्रशासनिक सुविधाओं तक विस्तार दिया जाए।
16 सितंबर 1994 को जिस छतरपुर अनुमंडल की आधारशिला रखी गई थी, 32 वर्ष बाद जनता यह जानना चाहती है कि आने वाले वर्षों में इसकी तस्वीर बदलने के लिए ठोस योजना क्या है?
छतरपुर की जनता किसी विशेष व्यक्ति या दल से उपकार नहीं मांग रही है। वह अपने अधिकार की सुविधाएं मांग रही है। सवाल यही है कि 32 साल बाद भी अगर इलाज के लिए बाहर जाना पड़े, निबंधन के लिए बाहर जाना पड़े, जाम से रोज जूझना पड़े और मुख्य विद्यालय के सामने कचरे का अंबार दिखे, तो आखिर विकास की प्राथमिकता तय कौन करेगा?
अब समय है कि छतरपुर अनुमंडल के विकास के लिए दलीय राजनीति से ऊपर उठकर एक दीर्घकालिक जनहित रोडमैप तैयार किया जाए और जनता के सामने यह स्पष्ट किया जाए कि अगले पांच वर्षों में कौन-कौन सी मूलभूत सुविधाएं धरातल पर उतारी जाएंगी।
पंचम कुमार
पत्रकार व सामाजिक चिंतक







