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जमुई के सरकारी स्कूलों में बदलाव की नई बयार: डीईओ धनंजय कुमार पासवान की मेहनत और डीएम श्री नवीन की सरपरस्ती ने रची नई इबारत


मुकेश कुमार/स्टेट ब्यूरो चीफ

जमुई(बिहार)।कभी उपेक्षा,जर्जर भवनों और अव्यवस्था के पर्याय माने जाने वाले जमुई के सरकारी स्कूल आज सकारात्मक बदलाव की ऐसी ऐतिहासिक मिसाल पेश कर रहे हैं,जिसने पूरे बिहार के शिक्षा जगत को हैरत में डाल दिया है।जिला शिक्षा अधिकारी धनंजय कुमार पासवान की प्रशासनिक सक्रियता, दिन-रात की मेहनत और जिलाधिकारी श्री नवीन के कुशल मार्गदर्शन व सरपरस्ती ने महज एक महीने के भीतर सरकारी शिक्षा व्यवस्था की पूरी तस्वीर और तकदीर बदलकर रख दी है।हाल ही में स्थानीय रावणेश्वर हॉल में आयोजित सांस्कृतिक संध्या में यह बदलाव केवल कागजों पर नहीं,बल्कि प्रत्यक्ष धरातल पर नजर आया।हॉल में उपस्थित दर्शकों की तालियों की गूंज और भावुक आंखें इस बात की गवाह बनीं कि जब प्रशासनिक इच्छाशक्ति और निष्ठा का मिलन होता है,तो असंभव भी संभव हो जाता है।
•अभिभावकों और समाज की सहभागिता से टूटा वर्षों पुराना मिथक •
अतीत में स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर सरकारी स्कूलों में ग्रामीणों और अभिभावकों की भागीदारी महज औपचारिकता तक सीमित रहती थी।इस धारणा को ध्वस्त करने के लिए डीईओ धनंजय कुमार पासवान के स्पष्ट निर्देशों पर जिले के प्रत्येक विद्यालय का सघन निरीक्षण और स्क्रीनिंग की गई।शिक्षकों और अधिकारियों ने गांव-गांव जाकर अभिभावकों को आमंत्रण भेजा और उन्हें आयोजन से जोड़ा।इस पहल का सीधा परिणाम यह हुआ कि समाज में वर्षों से बनी यह गलतफहमी दूर हुई और लोगों को यह अहसास हुआ कि उनके बच्चे अब गुणवत्तापूर्ण और संस्कारयुक्त शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
•बिना रिकॉर्डेड संगीत के लाइव प्रस्तुति—निजी स्कूलों को पछाड़ा •
रावणेश्वर हॉल के भव्य मंच पर स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम में सरकारी विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा से हर किसी को आश्चर्यचकित कर दिया।कार्यक्रम का सबसे बड़ा और अनोखा आकर्षण यह रहा कि पूरे आयोजन में किसी भी रिकॉर्डेड ट्रैक या डिजिटल साउंड का सहारा नहीं लिया गया।राज्य सरकार द्वारा हाल ही में नियुक्त संगीत शिक्षकों और प्रतिभाशाली विद्यार्थियों ने मंच पर एक साथ आकर लाइव गायन,वादन और नृत्य का ऐसा अद्भुत और जीवंत सामंजस्य पेश किया कि बड़े-बड़े निजी स्कूलों की प्रस्तुतियां भी इसके सामने फीकी नजर आने लगीं।
•सुदूरवर्ती व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की बेटियों का सशक्त मंचन•
कभी उग्रवाद और नक्सलियों का गढ़ माने जाने वाले गुरमाह और चोरमारा जैसे सुदूरवर्ती तथा दुर्गम इलाकों की बेटियां जब घर की दहलीज लांघकर जिले के मुख्य प्रशासनिक मंच पर पहुंचीं,तो वह दृश्य ऐतिहासिक बन गया।इन बेटियों ने जब पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर अपनी लोक-संस्कृति प्रस्तुत की,तो पूरा प्रेक्षागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

"कुएं का ठंडा जल पीपल की छांव रे,रुक जाओ परदेसी आज मेरे गांव रे..."
जैसे कालजयी लोकगीत के माध्यम से बेटियों ने जमुई के प्राकृतिक सौंदर्य और ईको-टूरिज्म का ऐसा सजीव खाका खींचा कि मंच पर मौजूद जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की आंखें भी गर्व और भावुकता से नम हो गईं।इसके अलावा,शहीद भगत सिंह व चंद्रशेखर आजाद के महान बलिदान पर आधारित जीवंत नाटक और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों पर छात्राओं द्वारा दी गई मर्मस्पर्शी प्रस्तुतियों ने सीधे दर्शकों के दिलों को छू लिया।
•प्रशासनिक तालमेल और दृढ़ इच्छाशक्ति ने रची सफलता की इबारत• 
अत्यंत अल्प समय में इतना व्यापक और सकारात्मक परिवर्तन लाना आसान काम नहीं था।जिला शिक्षा अधिकारी धनंजय कुमार पासवान ने खुद कमान संभालते हुए देर रात तक स्कूलों की स्क्रीनिंग,तैयारियों का जायजा और शिक्षकों का मार्गदर्शन किया।वहीं,जिलाधिकारी श्री नवीन का निरंतर मार्गदर्शन,प्रोत्साहन और अभिभावक जैसा रुख इस पूरी सफलता का मुख्य आधार स्तंभ बना।प्रशासनिक तालमेल,निष्ठापूर्ण परिश्रम और दूरदर्शी सोच के बल पर जमुई जिले ने आज न केवल अपनी पुरानी छवि को पीछे छोड़ दिया है,बल्कि पूरे बिहार राज्य के सामने सरकारी शिक्षा के सुदृढ़ीकरण और कायाकल्प का एक ऐसा मॉडल पेश किया है जिसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई दे रही है।