इप्टा की सांस्कृतिक पाठशाला की 104वीं कड़ी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के फायदे और चुनौतियों पर हुआ मंथन
मेदिनीनगर : इप्टा द्वारा संचालित सांस्कृतिक पाठशाला की 104वीं कड़ी में ‘एआई : अभिशाप या वरदान’ विषय पर संवाद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता इप्टा के जिला अध्यक्ष प्रेम भसीन और अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय सचिव केडी सिंह ने संयुक्त रूप से की। संवाद के दौरान वक्ताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव, इसके सकारात्मक उपयोग तथा मानव जीवन पर पड़ने वाले संभावित दुष्प्रभावों पर विस्तार से विचार साझा किए।
वक्ताओं ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तेजी से आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है। शिक्षा, चिकित्सा, तकनीक, शोध और विभिन्न क्षेत्रों में एआई के इस्तेमाल से काम को आसान और तेज बनाने में मदद मिल रही है। हालांकि, इसके बढ़ते इस्तेमाल के साथ मानव की रचनात्मकता, बौद्धिक क्षमता और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता को लेकर कई गंभीर सवाल भी सामने आ रहे हैं।
अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय सचिव केडी सिंह ने कहा कि हर नया आविष्कार अपने साथ एक नई संस्कृति लेकर आता है। एआई के आने से मानव की सृजनशीलता प्रभावित हो रही है। लोग अपने ज्ञान और अनुभव पर भरोसा करने के बजाय कृत्रिम ज्ञान पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अपनी रचनात्मक क्षमता और स्वतंत्र सोच को बचाए रखना बड़ी चुनौती है।
सुरेश सिंह ने एआई के बढ़ते इस्तेमाल पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे मानव की बुद्धिमत्ता और बौद्धिक क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।
वहीं, फिजियोथैरेपिस्ट कुलदीप राम ने कहा कि एआई ने आविष्कार और तकनीकी विकास की गति को काफी तेज किया है। इसके सकारात्मक पक्षों को देखते हुए यदि इसकी कमियों और संभावित खतरों को ध्यान में रखकर संतुलित तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मानव समाज के लिए वरदान साबित हो सकता है।
घनश्याम कुमार ने कहा कि एआई वरदान है या अभिशाप, यह गंभीर अध्ययन और शोध का विषय है। इसके प्रभावों को समझने के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के बीच लगातार संवाद और विमर्श की जरूरत है।
कार्यक्रम के दौरान एआई के भविष्य, मानव जीवन पर इसके प्रभाव तथा इसके जिम्मेदार उपयोग को लेकर प्रतिभागियों के बीच भी विचार-विमर्श हुआ। कार्यक्रम में अजीत कुमार, संजीव कुमार संजू सहित बड़ी संख्या में इप्टाकर्मी मौजूद रहे।







