निर्वाचन आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियां लोकतंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल : हृदयानंद मिश्र
मतदाता सूची और चुनावी डेटा को लेकर उठे प्रश्नों पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण जरूरी
पलामू : झारखंड प्रदेश राजीव गांधी विचार समिति के अध्यक्ष हृदयानंद मिश्र ने निर्वाचन आयोग के भीतर दो निर्वाचन आयुक्तों द्वारा पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 बार दर्ज कराई गई आपत्तियों को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय बताते हुए कहा है कि यह मामला केवल चुनावी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि मतदाता के अधिकार और चुनावी संस्थाओं में जनता के विश्वास से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा कि द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के अनुसार निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म-6 में बदलाव तथा निर्वाचन डेटा के नियंत्रण जैसे विषयों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के अनुसार कुछ कदमों को उन्होंने “unauthorised” और “illegal” तक बताया।
हृदयानंद मिश्र ने कहा कि सवाल किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के पक्ष अथवा विपक्ष का नहीं, बल्कि उस संवैधानिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का है जिसके माध्यम से नागरिकों के मतदान के अधिकार की रक्षा होती है। यदि निर्वाचन आयोग के भीतर ही किसी निर्णय की प्रक्रिया, अधिकार और पारदर्शिता को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज होती हैं, तो उन आपत्तियों और उनके निस्तारण का पूरा तथ्य देश के सामने आना चाहिए।
उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग ने अपनी ओर से स्पष्ट किया है कि संस्थागत deliberation में अलग-अलग मत, टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं तथा सभी महत्वपूर्ण निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
“इसीलिए अब आवश्यकता आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि पूर्ण पारदर्शिता की है। निर्वाचन आयोग को स्पष्ट करना चाहिए कि जिन आपत्तियों का उल्लेख सामने आया है, वे किन निर्णयों से संबंधित थीं, उन पर क्या कार्रवाई हुई और मतदाता सूची तथा उसके डिजिटल डेटाबेस की सुरक्षा एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कौन-कौन से संस्थागत नियंत्रण मौजूद हैं।”
श्री मिश्र ने कहा कि मतदाता सूची में किसी योग्य नागरिक का नाम जुड़ना अथवा किसी नागरिक का नाम हटना महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है; इसका सीधा संबंध उसके संवैधानिक मतदान अधिकार से है। इसलिए प्रत्येक संशोधन के पीछे स्पष्ट प्रक्रिया, रिकॉर्ड, अपील का प्रभावी अवसर और जवाबदेही आवश्यक है।
उन्होंने कहा, “वोट किसी सरकार, राजनीतिक दल या किसी संस्था की कृपा नहीं है। वोट नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता, पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता पर जनता का भरोसा लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है। इस भरोसे की रक्षा केवल आश्वासन से नहीं, बल्कि तथ्यों को सार्वजनिक करने और हर उचित प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देने से होगी।”
हृदयानंद मिश्र ने मांग की कि निर्वाचन प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े सभी महत्वपूर्ण निर्णयों में पारदर्शिता, विधिक प्रक्रिया, स्वतंत्र संस्थागत निगरानी और नागरिकों के प्रभावी अपील अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए, ताकि किसी भी योग्य मतदाता को अपने मताधिकार से वंचित होने की आशंका न रहे।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता बदलती रहती है, सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन मतदाता का अधिकार स्थायी है। इसलिए चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता की रक्षा किसी दल का नहीं, पूरे राष्ट्र का दायित्व है।





