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आज हाई कोर्ट ने जो फैसला दिया है, उसकी नींव दरअसल राज्य सरकार के फैसले के दिन ही रख दी गई थी।


अगर सरकार में इस मामले को लेकर थोड़ी सी भी गंभीरता होती, तो सीबीआई जांच का आदेश दे देती। 

झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) एक संवैधानिक संस्था है, जिसके फैसलों को पलटने के पहले पूरी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था, लेकिन वहाँ तो चेयरमैन समेत सभी सदस्य इस्तीफा दे चुके हैं, फिर फैसले कौन लेता? यह सब कुछ जानने के बावजूद, राज्य सरकार ने जान बुझ कर छात्रों का आंदोलन खत्म करवाने के लिए कैबिनेट से हवा-हवाई आदेश निकाला। 

जब राज्य सरकार के एक मंत्री द्वारा जेपीएससी चेयरमैन समेत सभी सदस्यों का इस्तीफा मांगा गया, एवं सरकार द्वारा उसे राज्यपाल को भेजा गया था, तो सरकार को पूरी प्रक्रिया में निश्चित तौर पर कुछ गलत लगा होगा। और अगर कुछ गलत नहीं हुआ, तो फिर चेयरमैन समेत दो दर्जन लोग जेल में क्यों हैं? हर दिन अखबारों में क्या छप रहा है? लेकिन इन सबके बावजूद, राज्य सरकार ने युवाओं को जितना बड़ा धोखा दिया, वैसा शायद ही कहीं और देखने को मिलेगा।

सबको पता है कि राज्य सरकार के किसी भी कर्मचारी को निकालने अथवा बर्खास्त करने की एक प्रक्रिया होती है, जिसमें विभागीय जाँच और उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका देना अनिवार्य शर्त है। क्या सरकार को यह नहीं पता था? तो फिर किस आधार पर कैबिनेट से तुगलकी फरमान निकाला गया? 

उन्हें सब पता था और उन्होंने जान-बुझ कर सब कुछ किया। लेकिन शायद हमारे बच्चों ने JSSC CGL का हश्र देखने के बाद भी, राज्य सरकार की नीयत के बारे कुछ भी नहीं सीखा था। अफसोस इस बात का है कि इतना बड़ा आंदोलन करने के बावजूद, झारखंड के लाखों अभ्यर्थी राज्य सरकार के वादों पर भरोसा कर के फिर एक बार ठगे गए।

झारखंड को बने 26 साल हो गए, और इस तथाकथित अबुआ सरकार को सत्ता में 7 साल हो गए, लेकिन दुर्भाग्य देखिए, अभी तक यहाँ एक पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया तक नहीं बन पाई। शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल जैसे बुनियादी मुद्दों पर सरकार की विफलता जगजाहिर है। कभी-कभी लगता है कि क्या इसी लिए यह अलग राज्य बनाया गया था? राज्य के युवाओं, छात्रों एवं आम जनता को इस दिशा में गंभीरता से सोचने की जरूरत है।