BREAKING NEWS

logo

Advertisement
Advertisement

FPI की निवेश रणनीति में बदलाव के संकेत, शेयर बाजार में बिकवाली के बीच IPO और डेट पर नजर


नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPI की गतिविधियां इस समय एक अलग तस्वीर पेश कर रही हैं। एक तरफ विदेशी निवेशक सेकेंडरी इक्विटी मार्केट में लगातार बिकवाली कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर IPO, कुछ डेट इंस्ट्रूमेंट्स और चुनिंदा मिड-कैप तथा स्मॉल-कैप शेयरों में उनकी दिलचस्पी बनी हुई है। बाजार विश्लेषण में इस पैटर्न को व्यापक रूप से भारत से पूंजी निकालने के बजाय चयनात्मक निवेश रणनीति के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

सेकेंडरी मार्केट में बिकवाली

सितंबर में विदेशी निवेशकों की इक्विटी बिकवाली ने भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ाया है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर के दौरान FPI का इक्विटी आउटफ्लो करीब ₹21,000 करोड़ के आसपास पहुंच गया था। महंगा कच्चा तेल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी, रुपये की कमजोरी और वैश्विक अनिश्चितता को विदेशी निवेशकों के लिए प्रमुख चिंता वाले कारकों में गिना गया है।

इसका असर प्रमुख शेयर सूचकांकों पर भी दिखाई दिया है। हालांकि विदेशी बिकवाली के बावजूद घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी ने बाजार को कुछ सहारा दिया है।

IPO में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी

दिलचस्प बात यह है कि सूचीबद्ध शेयरों में बिकवाली के बावजूद विदेशी निवेशक Primary Market यानी IPO बाजार से पूरी तरह दूर नहीं हुए हैं।

19 सितंबर तक के आंकड़ों के अनुसार, इस महीने प्राथमिक बाजार के जरिए FPI निवेश करीब ₹2,703 करोड़ रहा था। 2026 में उस समय तक प्राथमिक बाजार के माध्यम से कुल FPI निवेश लगभग ₹48,550 करोड़ बताया गया था।

इससे यह संकेत मिलता है कि विदेशी निवेशक हर तरह के भारतीय इक्विटी निवेश को एक साथ नहीं छोड़ रहे, बल्कि नए इश्यू और चुनिंदा कंपनियों में अवसर तलाश रहे हैं।

मिड-कैप और स्मॉल-कैप में चयनात्मक निवेश

FPI गतिविधियों में एक और महत्वपूर्ण पहलू कुछ मिड-कैप और स्मॉल-कैप कंपनियों में निवेश है। बाजार रिपोर्ट के मुताबिक, विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी कुछ चुनिंदा कंपनियों और अवसरों तक सीमित दिखाई दे रही है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरे मिड-कैप या स्मॉल-कैप सेगमेंट में व्यापक विदेशी खरीदारी हो रही है।

बल्कि निवेश का तरीका कंपनी-दर-कंपनी आधार पर अधिक चयनात्मक दिखाई देता है।

डेट मार्केट में भी गतिविधि

इक्विटी के अलावा विदेशी निवेशकों की कुछ गतिविधियां डेट मार्केट में भी देखी गई हैं। अगस्त 2026 तक FY27 में डेट इंस्ट्रूमेंट्स में FPI का शुद्ध निवेश ₹68,120 करोड़ दर्ज किया गया था। इससे पता चलता है कि विदेशी पूंजी का एक हिस्सा शेयरों के बजाय निश्चित आय वाले साधनों की ओर भी गया है।

हालांकि ब्याज दर, अमेरिकी Treasury yields और मुद्रा जोखिम जैसे कारक डेट निवेश के फैसलों को भी प्रभावित करते हैं।

आखिर विदेशी निवेशक ऐसा क्यों कर रहे हैं?

विदेशी निवेशकों की रणनीति पर कई वैश्विक और घरेलू परिस्थितियों का असर पड़ रहा है। अमेरिका में बॉन्ड यील्ड ऊंची रहने पर डॉलर आधारित परिसंपत्तियां आकर्षक हो सकती हैं। दूसरी ओर, भारत में ऊंचे कच्चे तेल के दाम रुपये और महंगाई को लेकर चिंता बढ़ा सकते हैं।

ऐसे माहौल में कुछ निवेशक व्यापक बाजार में जोखिम कम करते हुए अपेक्षाकृत चुनिंदा अवसरों पर पूंजी लगाने की रणनीति अपना सकते हैं। बाजार विशेषज्ञों ने भी हालिया FPI गतिविधि को इसी तरह की चयनात्मकता से जोड़ा है।

FPI और घरेलू निवेशकों की तस्वीर अलग

जहां विदेशी निवेशकों की इक्विटी बिकवाली बाजार में दबाव पैदा कर रही है, वहीं घरेलू संस्थागत निवेशक यानी DII लगातार खरीदारी के जरिए इस दबाव को कुछ हद तक संतुलित कर रहे हैं।

इस वजह से भारतीय बाजार में विदेशी और घरेलू पूंजी के बीच एक अलग तरह का संतुलन देखने को मिल रहा है। यदि विदेशी बिकवाली बनी रहती है, तो घरेलू संस्थागत निवेशकों की भूमिका बाजार की दिशा के लिए महत्वपूर्ण बनी रह सकती है।

नियामकीय बदलाव भी महत्वपूर्ण

इसी बीच भारतीय बाजार नियामक SEBI ने 24 सितंबर को विदेशी भागीदारी और बाजार ढांचे से जुड़े कई सुधारों को मंजूरी दी। इनमें कुछ क्षेत्रों में विदेशी निवेशकों की बाजार पहुंच बढ़ाने से जुड़े उपाय भी शामिल हैं।

इन बदलावों का असर आने वाले समय में विदेशी निवेशकों के लिए उपलब्ध निवेश विकल्पों और बाजार भागीदारी पर पड़ सकता है।

आगे किन बातों पर रहेगी नजर?

आने वाले सप्ताहों में FPI के रुख को समझने के लिए कई संकेतकों पर नजर रखी जाएगी। इनमें कच्चे तेल की कीमत, अमेरिकी Treasury yield, डॉलर-रुपया विनिमय दर, भारत की कंपनियों के तिमाही नतीजे, IPO गतिविधियां और वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम प्रमुख हैं।

अगर वैश्विक जोखिम कम होते हैं और भारतीय बाजार में विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ता है, तो FPI गतिविधियों का स्वरूप बदल सकता है। इसके विपरीत, ऊंची वैश्विक यील्ड और महंगे तेल जैसे दबाव बने रहने पर चयनात्मक निवेश की प्रवृत्ति जारी रह सकती है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, FPI की मौजूदा गतिविधि में विरोधाभासी तस्वीर दिखाई दे रही है। सेकेंडरी शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी है, लेकिन IPO, कुछ डेट इंस्ट्रूमेंट्स और चुनिंदा मिड-कैप व स्मॉल-कैप अवसरों में उनकी भागीदारी बनी हुई है। उपलब्ध आंकड़े इसलिए यह संकेत देते हैं कि विदेशी पूंजी की रणनीति में चयनात्मकता बढ़ी है, न कि सभी भारतीय परिसंपत्तियों से एक समान दूरी बनाई गई है।