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धपरा गांव के बच्चों की मजबूरी पर कब जागेंगा सिस्टम


गोड्डा के धपरा गांव में 1977 में बना स्कूल, 2026 में भी पगडंडी के भरोसे स्कूल पहुंचते हैं बच्चे

• धपरा गांव के बच्चों की मजबूरी पर कब जागेंगा सिस्टम 

गोड्डा‌ : जिले के बसंतराय प्रखंड अंतर्गत धपरा गांव की तस्वीर विकास के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। जिस विद्यालय ने दशकों से क्षेत्र के हजारों बच्चों को शिक्षा देकर डॉक्टर, इंजीनियर और विभिन्न बड़े पदों तक पहुंचाया, उसी विद्यालय तक पहुंचने के लिए आज भी विद्यार्थियों को पक्की सड़क नहीं, बल्कि पगडंडी और कीचड़ भरे रास्ते का सहारा लेना पड़ रहा है।

यह कहानी सिर्फ एक सड़क की नहीं है। यह उन दावों की कहानी है, जिनमें गांव-गांव तक विकास पहुंचने की बातें तो खूब होती हैं, लेकिन एक स्कूल तक सुरक्षित रास्ता पहुंचाने की जिम्मेदारी वर्षों तक कागजों और आश्वासनों में अटकी रहती है।

1977 में स्थापित हुआ विद्यालय, लेकिन रास्ता आज भी अधूरा

बताया जाता है कि धपरा गांव में वर्ष 1977 में विद्यालय की स्थापना हुई थी। उस समय स्थानीय लोगों ने शिक्षा के महत्व को समझते हुए अपनी निजी जमीन तक देकर विद्यालय के लिए जगह उपलब्ध कराई। ग्रामीणों के सहयोग और त्याग से खड़ा हुआ यह विद्यालय आज क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान बन चुका है।

समय बदला, सरकारें बदलीं, मंत्री बदले, विधायक बदले, सांसद बदले और अधिकारियों के चेहरे भी बदलते रहे। विद्यालय का स्वरूप भी बदला और इसे प्लस टू स्तर तक विस्तारित किया गया। लेकिन एक चीज नहीं बदली—विद्यालय तक पहुंचने वाला रास्ता। आज भी विद्यार्थियों को विद्यालय पहुंचने के लिए पगडंडी और खराब रास्ते से गुजरना पड़ता है। बारिश के मौसम में यही रास्ता कीचड़ में तब्दील हो जाता है और बच्चों की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।

1500 से ज्यादा विद्यार्थी

जानकारी के अनुसार, इस विद्यालय में करीब 1500 से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इनमें लगभग 1200 विद्यार्थी हाई स्कूल और प्लस टू स्तर के हैं, जबकि करीब 300 विद्यार्थी मध्य विद्यालय में पढ़ते हैं। इतने बड़े शिक्षण संस्थान में पढ़ने वाले बच्चों के लिए एक सुरक्षित और सुगम रास्ता होना कोई विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरत है। सवाल यह है कि जब एक विद्यालय में हजारों बच्चे पढ़ते हों, तो क्या वहां तक सड़क पहुंचाना प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए?

क्या विद्यालय को प्लस टू का दर्जा देना ही पर्याप्त है..?

अगर बच्चे विद्यालय तक पहुंचने के लिए कीचड़ और पगडंडी से गुजरने को मजबूर हैं, तो फिर विकास के इन दावों का फायदा आखिर किसे मिल रहा है?

बारिश में सबसे ज्यादा परेशानी

बरसात के दिनों में धपरा के इस विद्यालय की तस्वीर और भी गंभीर हो जाती है। रास्ते में कीचड़ और जलजमाव के कारण विद्यार्थियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। स्कूल जाने वाले बच्चों के सामने मजबूरी है, पढ़ाई करनी है तो इसी रास्ते से जाना होगा। कई बार बच्चे गंदे और कीचड़ भरे रास्ते से होकर विद्यालय पहुंचते हैं। यह स्थिति केवल विद्यार्थियों की परेशानी नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था और ग्रामीण विकास के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल है। एक तरफ सरकार बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की बात करती है, स्कूलों को अपग्रेड करने की योजनाएं चलती हैं, दूसरी तरफ उसी स्कूल तक पहुंचने का रास्ता वर्षों से अधूरा पड़ा है।

जिस गांव ने आजादी के आंदोलन में योगदान दिया, उसे आज भी रास्ते का इंतजार

धपरा गांव का इतिहास भी कम महत्वपूर्ण नहीं बताया जाता। ग्रामीणों के अनुसार, आजादी के आंदोलन के दौर में इस गांव के लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
इसी गांव से जुड़े जेल भरो आंदोलन के क्रांतिकारी मोहम्मद शहाबुद्दीन का भी स्थानीय स्तर पर उल्लेख किया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि जिस गांव के लोगों ने देश और समाज के लिए योगदान दिया, आज उसी गांव को बुनियादी सुविधाओं के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ रहा है।

क्या ऐसे योगदान को याद रखने के लिए केवल भाषण काफी हैं..?

अगर किसी स्वतंत्रता सेनानी या आंदोलनकारी का योगदान महत्वपूर्ण रहा है, तो उनके नाम पर कोई स्मारक, योजना, सड़क या सार्वजनिक पहचान क्यों नहीं दिखाई देती? कम से कम उनके नाम पर एक बोर्ड लगाकर आने वाली पीढ़ियों को उनके संघर्ष की जानकारी दी जा सकती थी।

नेताओं से ग्रामीणों का सवाल

धपरा के लोगों की नाराजगी केवल व्यवस्था से नहीं, बल्कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों से भी है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता गांव-गांव पहुंचते हैं। जनता से विकास के वादे किए जाते हैं। सड़क, शिक्षा, बिजली और अन्य सुविधाओं को लेकर आश्वासन दिए जाते हैं। लेकिन चुनाव बीतने के बाद वही समस्याएं फिर वहीं खड़ी दिखाई देती हैं। सवाल यह है कि जब हजारों बच्चों के भविष्य का सवाल हो, तब इस सड़क की सुध लेने के लिए किसी जनप्रतिनिधि को वर्षों तक इंतजार क्यों करना पड़ा?

समस्या जस की तस बनी रही

यह स्थिति किसी एक सरकार या किसी एक जनप्रतिनिधि पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि दशकों से चली आ रही पूरी व्यवस्था की जवाबदेही मांगती है।

जिस जमीन पर स्कूल खड़ा है, उसी स्कूल तक रास्ता नहीं

सबसे भावुक करने वाली बात यह है कि ग्रामीणों के अनुसार विद्यालय की स्थापना के लिए उनके पूर्वजों ने अपनी निजी जमीन तक उपलब्ध कराई थी। यानी जिन परिवारों ने आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए अपनी जमीन दी, आज उन्हीं के गांव के बच्चे विद्यालय तक पहुंचने के लिए एक बेहतर रास्ते की तलाश में हैं।

यह सवाल केवल सड़क का नहीं है।यह उन लोगों के त्याग का भी सवाल है जिन्होंने शिक्षा के लिए जमीन दी।
यह उन हजारों विद्यार्थियों के अधिकार का सवाल है जो हर दिन इसी रास्ते से विद्यालय पहुंचते हैं। और यह उन जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों की जवाबदेही का सवाल है, जिनके पास विकास योजनाओं को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी है।