नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार में उतार-चढ़ाव जारी है। गुरुवार, 17 सितंबर 2026 को Brent crude करीब 105–106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता रहा। हालांकि पिछले दिनों की तेजी के बाद कीमतों में कुछ नरमी आई है, लेकिन मध्य-पूर्व में जारी तनाव और Strait of Hormuz से जुड़े जोखिमों के कारण तेल बाजार पर दबाव और अनिश्चितता बनी हुई है। बुधवार को Brent और अमेरिकी WTI दोनों में करीब 3 डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी। इसके बाद गुरुवार के शुरुआती कारोबार में भी कीमतों में कुछ और नरमी देखी गई। Reuters के अनुसार, Brent करीब $105.64 प्रति बैरल और WTI करीब $102.10 प्रति बैरल तक पहुंच गया था। तेल कीमतों में यह गिरावट मुख्य रूप से इस खबर के बाद आई कि सऊदी अरब ओमान के रास्ते एशियाई रिफाइनरियों को अतिरिक्त कच्चा तेल उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है। इससे बाजार में तत्काल आपूर्ति संकट को लेकर कुछ चिंता कम हुई है। तेल बाजार की नजर अभी भी Strait of Hormuz पर बनी हुई है। यह जलमार्ग फारस की खाड़ी को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ता है और सामान्य परिस्थितियों में वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। क्षेत्र में संघर्ष और जहाजों की आवाजाही में रुकावट ने बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ाई है। हालांकि हाल के दिनों में इस मार्ग से तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की आवाजाही में कुछ सुधार के संकेत मिले हैं, लेकिन स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। इसी वजह से कारोबारियों के लिए किसी भी नए हमले, समुद्री व्यवधान या राजनीतिक घटनाक्रम का असर तेल कीमतों पर तेजी से पड़ सकता है। मध्य-पूर्व की मौजूदा स्थिति में सऊदी अरब की East-West pipeline भी महत्वपूर्ण बन गई है। इस पाइपलाइन से तेल को Red Sea क्षेत्र तक पहुंचाया जाता है। हाल में इसके कुछ हिस्सों को नुकसान पहुंचने के बाद सऊदी अरब के Yanbu क्षेत्र से होने वाले निर्यात पर असर पड़ा है। सऊदी अरब अब वैकल्पिक मार्गों और समुद्री परिवहन के जरिए एशियाई खरीदारों तक अतिरिक्त तेल पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। बाजार में इसी खबर से आपूर्ति बाधित होने की आशंका कुछ कम हुई और तेल कीमतों पर दबाव आया। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत का आयात बिल बढ़ सकता है और इससे रुपये तथा महंगाई पर भी दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा महंगे कच्चे तेल का असर विमानन, परिवहन, रसायन, प्लास्टिक और कई अन्य उद्योगों की लागत पर पड़ सकता है। इसलिए भारतीय शेयर बाजार और मुद्रा बाजार के निवेशक भी Brent crude की कीमत पर लगातार नजर रखते हैं। आने वाले दिनों में तेल की कीमतों की दिशा मुख्य रूप से मध्य-पूर्व के घटनाक्रम, Strait of Hormuz में जहाजों की आवाजाही, सऊदी अरब की तेल आपूर्ति बहाल करने की क्षमता और वैश्विक मांग पर निर्भर करेगी। फिलहाल अतिरिक्त सऊदी आपूर्ति की खबर से कीमतों में कुछ राहत मिली है, लेकिन क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ने पर आपूर्ति जोखिम फिर से बढ़ सकता है। Reuters से बातचीत में कुछ बाजार विश्लेषकों ने भी चेतावनी दी है कि यदि हॉर्मुज और Red Sea क्षेत्र में व्यवधान जारी रहते हैं तो तेल कीमतों में दोबारा तेज उछाल देखने को मिल सकता है। यानी फिलहाल Brent 106 डॉलर के आसपास है, लेकिन बाजार की असली चिंता कीमत से ज्यादा आपूर्ति की स्थिरता को लेकर है। मध्य-पूर्व में होने वाला कोई भी बड़ा घटनाक्रम आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमत और वैश्विक बाजार दोनों को प्रभावित कर सकता है।पिछले सत्र की तेजी के बाद कीमतों में नरमी
Strait of Hormuz बना सबसे बड़ा जोखिम
सऊदी पाइपलाइन पर हमले का असर
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है कच्चे तेल की कीमत?
आगे किस दिशा में जाएंगे तेल के दाम?
कच्चा तेल 106 डॉलर के आसपास, हॉर्मुज और मध्य-पूर्व तनाव से बाजार में चिंता






