BREAKING NEWS

logo

Advertisement
Advertisement

डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव जारी, RBI की सक्रियता से मुद्रा को मिला सहारा


मुंबई। भारतीय मुद्रा बाजार में रुपये की चाल पर इस समय कई घरेलू और वैश्विक कारकों का असर दिखाई दे रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया हाल के कारोबार में 96 के स्तर के आसपास दबाव में रहा, हालांकि बाजार में भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI की संभावित सक्रियता से रुपये की गिरावट को सीमित करने में मदद मिलने की बात बाजार प्रतिभागियों ने कही है। 25 सितंबर के कारोबार में रुपया करीब 15 पैसे मजबूत होकर ₹95.81 प्रति डॉलर पर बंद हुआ।

96 के स्तर के आसपास क्यों बना दबाव?

रुपये पर दबाव के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर की मांग, आयातकों की डॉलर खरीद और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें प्रमुख हैं। महंगा क्रूड भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। तेल की कीमत बढ़ने पर आयात के लिए अधिक डॉलर की जरूरत पड़ सकती है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है।

इसके अलावा वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और दुनिया भर में ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदें भी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को प्रभावित कर रही हैं।

RBI की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण?

रुपये में अचानक और तेज गिरावट को नियंत्रित करने के लिए RBI विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है। हालिया कारोबार में बाजार प्रतिभागियों ने सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिक्री को RBI की संभावित कार्रवाई से जोड़ा है।

रिपोर्टों के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने स्पॉट मार्केट के अलावा डॉलर-रुपया sell-buy swaps जैसे उपायों का भी इस्तेमाल किया। इन कदमों का एक उद्देश्य बाजार में रुपये की अतिरिक्त तरलता को समायोजित करना भी रहा।

25 सितंबर को क्या हुआ?

25 सितंबर के कारोबार में रुपया पिछले बंद स्तर की तुलना में मजबूत होकर करीब ₹95.81 प्रति डॉलर पर पहुंचा। कारोबार के दौरान मुद्रा करीब ₹95.94 तक कमजोर हुई थी, लेकिन बाद में इसमें सुधार देखने को मिला। बाजार सूत्रों ने इस रिकवरी में RBI की संभावित डॉलर बिक्री और अन्य बाजार गतिविधियों की भूमिका बताई।

कच्चे तेल की कीमत भी अहम कारक

रुपये के लिए कच्चे तेल की कीमत एक महत्वपूर्ण बाहरी कारक बनी हुई है। हालिया रिपोर्ट के मुताबिक ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ था। महंगे तेल से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है और इससे विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ने की संभावना रहती है।

यदि तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो इसका असर मुद्रास्फीति और चालू खाते के संतुलन पर भी पड़ सकता है।

आयातकों की डॉलर मांग से भी दबाव

बाजार में आयातकों की डॉलर खरीद भी रुपये की दिशा को प्रभावित कर रही है। कंपनियों को विदेशों से सामान और सेवाओं का भुगतान करने के लिए डॉलर की जरूरत होती है। ऐसे समय में यदि एक साथ डॉलर की मांग बढ़ती है, तो घरेलू मुद्रा पर दबाव दिखाई दे सकता है।

हालिया कारोबार में महीने के अंत में भुगतान संबंधी जरूरतों को देखते हुए डॉलर की मांग बढ़ने की बात भी रिपोर्टों में सामने आई है।

आगे रुपये की दिशा किन बातों पर निर्भर करेगी?

आने वाले दिनों में रुपये की चाल केवल RBI के हस्तक्षेप से तय नहीं होगी। कच्चे तेल की कीमत, अमेरिकी डॉलर की मजबूती, वैश्विक बॉन्ड यील्ड, विदेशी पूंजी का प्रवाह और भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

Bank of Baroda की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, रुपये की चाल को किसी एक कारण से समझाना मुश्किल है। रिपोर्ट में मौलिक आर्थिक परिस्थितियों, RBI के हस्तक्षेप और बाजार की धारणा—तीनों को महत्वपूर्ण कारकों के रूप में देखा गया है।

RBI के लिए संतुलन बनाए रखना चुनौती

केंद्रीय बैंक के सामने एक ओर रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को सीमित रखने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप के साथ घरेलू बैंकिंग प्रणाली की तरलता को भी संभालना पड़ता है। इसी वजह से RBI स्पॉट और फॉरवर्ड मार्केट के अलावा स्वैप जैसे अलग-अलग साधनों का इस्तेमाल कर सकता है।

आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है?

रुपये की कमजोरी का असर केवल मुद्रा बाजार तक सीमित नहीं रहता। डॉलर महंगा होने पर आयातित कच्चा माल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, कुछ औद्योगिक उत्पाद और विदेश से जुड़ी सेवाओं की लागत प्रभावित हो सकती है। वहीं दूसरी ओर, डॉलर में कमाई करने वाले निर्यातकों को कमजोर रुपया अलग तरह का प्रभाव दे सकता है।

इसलिए रुपये की चाल का असर अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों पर अलग-अलग तरीके से पड़ता है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, रुपया 96 के स्तर के आसपास दबाव में जरूर रहा है, लेकिन हालिया कारोबार में RBI की संभावित सक्रियता ने गिरावट को सीमित करने में भूमिका निभाई है। 25 सितंबर को रुपया करीब ₹95.81 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। आगे इसकी दिशा कच्चे तेल, डॉलर की वैश्विक मजबूती, विदेशी पूंजी प्रवाह, आयातकों की मांग और RBI की बाजार गतिविधियों पर निर्भर करेगी।