क्या बी. टी. पी. एस. मे विस्थापितों के सुलगते आंदोलन और राजनीतिक गतिरोध से 800 MW प्लांट का अधर में लटकेगा भविष्य?
बोकारो थर्मल:
अलका मिश्रा/ जोगेंद्र की रिपोर्ट:
झारखंड के औद्योगिक गौरव की रीढ़ कहा जाने वाला बोकारो थर्मल (BTPS) इस समय एक ऐतिहासिक प्रशासनिक और रणनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। 210x3=630 मेगावाट (MW) के पुराने पावर प्लांट के बंद होने और स्क्रैप के बाद बेच देने से इस पूरे क्षेत्र की आर्थिक रफ्तार थम सी गई है। डीवीसी (दामोदर घाटी निगम) प्रबंधन ने इस नुकसान की भरपाई के लिए 800 मेगावाट (MW) के नए सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट की घोषणा तो बड़े जोर-शोर से की, लेकिन धरातल की हकीकत बेहद कड़वी है। वर्तमान हालात गवाही दे रहे हैं कि स्थानीय विस्थापितों का आक्रोश, ज़मीनी मुकदमेबाजी और राजनीतिक दखलअंदाजी के कारण इस ड्रीम प्रोजेक्ट को शुरू करना प्रबंधन के लिए लोहे के चने चबाने जैसा साबित हो रहा है।
डीवीसी प्रबंधन लगातार यह दावा करता आया है कि परियोजना के विस्तार के लिए उसके पास पर्याप्त अधिकृत भूमि उपलब्ध है लेकिन इस दावे की अंदरूनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।
डीवीसी की तथाकथित अधिकृत जमीन का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस समय गहरे विवादों और अदालती मुकदमों में फंसा हुआ है।
स्थानीय स्तर पर जमीन की मिल्कियत और सीमाओं (Border Line) को लेकर रैयतों और प्रबंधन के बीच इतने तीखे मतभेद हैं कि डीवीसी के लिए अपनी ही घोषित जमीन पर सुरक्षा घेरा (बाउंड्री वॉल) बनाना भी नामुमकिन हो गया है। बिना बाउंड्री और स्पष्ट सीमांकन के करोड़ों रुपये के नए प्रोजेक्ट की नींव रखना एक दूर की कौड़ी नजर आता है।
बोकारो थर्मल के इस गतिरोध की सबसे बड़ी वजह विस्थापित संघर्ष समिति और स्थानीय बेरोजगारों का बढ़ता आक्रोश है। दशकों पहले भारत के इस पहले थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए अपनी उपजाऊ ज़मीनें कुर्बान करने वाले रैयतो और मूलवासियों की तीसरी पीढ़ी आज भी बुनियादी हक, उचित मुआवजे और स्थायी रोजगार के लिए दर-दर भटक रही है
हाल ही में प्लांट के मुख्य द्वारों पर स्थानीय बेरोजगारों द्वारा किया गया उग्र प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है कि जनता में भारी असंतोष है। स्थानीय लोगों का खुला आरोप है कि प्रबंधन बाहरी लोगों को नौकरियां दे रहा है जबकि स्थानीय युवाओं को दरकिनार किया जा रहा है
इस सुलगते हुए मुद्दे में स्थानीय राजनीतिक समीकरणों और क्षेत्रीय नेताओं के जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप ने आग में घी का काम किया है। हर राजनीतिक दल इसे अपने वोट बैंक के चश्मे से देख रहा है, जिसके चलते कोई भी विकास कार्य शुरू होने से पहले ही विवादों की भेंट चढ़ जाता है।
*पेंशनभोगियों पर '60 गुना भाड़े' का वार:* *कोर्ट पहुंचा मामला*
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा केवल विस्थापितों तक सीमित नहीं है, बल्कि डीवीसी को अपनी पूरी जिंदगी देने वाले रिटायर्ड कर्मचारियों पर भी इसका असर दिख रहा है। सेवानिवृत्ति के बाद परमानेंट कर्मियों के आवासों का भाड़ा अचानक 60 गुना तक बढ़ा दिया गया। इस तानाशाही नीति के खिलाफ डीवीसी पेंशनर समाज, बोकारो थर्मल ने सीधे तौर पर दामोदर घाटी निगम प्रबंधन के खिलाफ कानूनी मोर्चा खोल दिया है, जिसकी गूंज अदालतों (DVC Pensioner Samaj vs Damodar Valley Corporation) में सुनाई दे रही है।मजबूरी में आवास खाली कराए जाने से जहां एक तरफ ये कॉलोनियां जर्जर होकर भूतिया खंडहरों में बदल रही हैं, वहीं दूसरी तरफ इन पर भू-माफियाओं और अवैध कब्जेदारों का जाल फैलता जा रहा है
*त्रिपक्षीय हिस्सेदारी में ही छिपा है 'संजीवनी' का रास्ता*
इस पेचीदा और बहुआयामी संकट का समाधान किसी एक अधिकारी या एक सरकार के बूते का नहीं है। चूंकि दामोदर घाटी निगम (DVC) में भारत सरकार, झारखंड सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार तीनों की हिस्सेदारी है, इसलिए इसकी डूबती नैया को बचाने के लिए इन तीनों ताकतों को सामूहिक राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी।
सबसे पहले केंद्र और दोनों राज्य सरकारों को एकजुट होकर बुजुर्ग सेवानिवृत्त कर्मचारियों के 60 गुना बढ़े आवास भाड़े पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना होगा ताकि कोर्ट-कचहरी का विवाद थमे और कॉलोनियों को उजड़ने से बचाया जा सके।800 MW के नए प्लांट को यदि कागजों से निकालकर धरातल पर लाना है तो तीनों शेयरधारकों को एक संयुक्त हाई-पावर कमेटी बनानी होगी। झारखंड सरकार को प्रशासनिक स्तर पर पहल करके जमीनी विवाद सुलझाने होंगे और विस्थापितों को 85% तक रोजगार की गारंटी या उचित पुनर्वास पैकेज देना होगा
अगर प्लांट नहीं आया तो मिट जाएगा वजूद
बोकारो थर्मल महज एक पावर प्लांट नहीं है बल्कि पूरा बेरमो अनुमंडल और इसके आस-पास का स्थानीय बाजार, छोटे व्यवसाई और हजारों परिवार आर्थिक रूप से सीधे इसी व्यवस्था पर टिके हैं। वर्तमान में चल रहा 500 MW का इकलौता प्लांट बड़े पैमाने पर अस्थाई और आउटसोर्सिंग कर्मियों के भरोसे सांसें ले रहा है। यदि केंद्र और राज्य सरकारों के आपसी तालमेल की कमी के चलते 800 MW का नया प्रोजेक्ट यहाँ से छिन गया, तो बोकारो थर्मल का भविष्य हमेशा के लिए अंधकार में डूब जाएगा। एक समय औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व करने वाला यह कस्बा केवल इतिहास की किताबों का हिस्सा बनकर रह जाएगा। अब फैसला नीति-निर्माताओं को करना है कि वे इस बंद होते अध्याय को नया जीवन देते हैं या इसे पूरी तरह समाप्त होने के लिए छोड़ देते हैं।






