करम केवल पर्व नहीं, प्रकृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन-दर्शन से जुड़ने का अवसर है : शिल्पी नेहा तिर्की
रांची : रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय के अखड़ा में आयोजित करम महोत्सव में कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुईं। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि करम केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, परंपरा, संस्कृति और हमारे सामुदायिक जीवन-दर्शन को समझने का अवसर है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जुड़ने, अपनी समृद्ध विरासत को समझने और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संदेश देता है।
मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से अपने पारंपरिक ज्ञान, जीवन-पद्धति और संस्कृति का वाहक रहा है। जल, जंगल और जमीन के साथ संतुलित जीवन जीने से लेकर प्रकृति के संरक्षण तक, आदिवासी समाज के पास ज्ञान और अनुभव की ऐसी समृद्ध परंपरा है, जिससे आज के आधुनिक दौर में भी देश और समाज बहुत कुछ सीख सकता है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को केवल लाभार्थी के रूप में देखने के बजाय उसके ज्ञान, अनुभव, परंपराओं और जीवन-दृष्टि को समझने तथा उससे संवाद करने की आवश्यकता है। विकास की प्रक्रिया में आदिवासी समाज की भागीदारी केवल योजनाओं के लाभ तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसके पारंपरिक ज्ञान और अनुभव को भी सम्मान और उचित स्थान मिलना चाहिए।
शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि आदिवासी समाज भारत की प्राचीन सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस इतिहास, पहचान और योगदान को स्वीकार करना किसी दूसरे समाज के अधिकारों को कम करना नहीं है, बल्कि भारत के इतिहास, संस्कृति और विविधता को अधिक व्यापक और पूर्ण रूप से स्वीकार करना है।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के संरक्षण की चर्चा केवल संविधान में दिए गए अधिकारों और संवैधानिक संरक्षण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। संविधान ने अधिकारों और संरक्षण का मजबूत आधार प्रदान किया है, लेकिन वास्तविक सांस्कृतिक संरक्षण तभी संभव है, जब आदिवासी भाषाओं, लोकगीतों, लोकनृत्यों, पारंपरिक ज्ञान और अखड़ा जैसी सामुदायिक संस्थाओं एवं परंपराओं को भी संरक्षित और मजबूत किया जाए।
उन्होंने कहा कि भाषा, गीत, नृत्य और अखड़ा केवल संस्कृति के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों से संजोए गए ज्ञान, स्मृति, संवाद और सामुदायिक पहचान के जीवंत माध्यम हैं। अखड़ा जैसी संस्थाएं सामाजिक संवाद, सामुदायिक एकजुटता और सांस्कृतिक हस्तांतरण की महत्वपूर्ण कड़ी रही हैं। इसलिए इन्हें मजबूत करना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।
करम पर्व की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए मंत्री ने कहा कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की सीख कोई नई अवधारणा नहीं है। आदिवासी समाज ने पीढ़ियों से जल, जंगल, जमीन और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की परंपरा को आगे बढ़ाया है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ विकास जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब आदिवासी समाज का पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ सामंजस्य की जीवन-दृष्टि और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।
उन्होंने कहा कि करम पर्व अपनी जड़ों, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपनी सामुदायिक पहचान से जुड़ने का अवसर देता है। हमारी जिम्मेदारी है कि इस समृद्ध विरासत को केवल उत्सवों तक सीमित न रखें, बल्कि नई पीढ़ी को इसके ज्ञान, मूल्यों और जीवन-दृष्टि से जोड़ें।
मंत्री ने कहा कि करम पर्व हमें प्रकृति के प्रति सम्मान, समुदाय के प्रति जिम्मेदारी और अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति सजग रहने का संकल्प देता है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों को याद करने, अपनी भाषा और संस्कृति को सहेजने तथा इस समृद्ध विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की प्रेरणा देता है।






