जेपीएससी तथा जेएसएससी फर्जीवाड़े के मुद्दे पर चल रहे आंदोलन में छात्र अपने एवं आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए ईमानदार तथा पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया के लिए संघर्षरत हैं।
ये युवा सिर्फ नियुक्ति प्रक्रियाओं में समान अवसर एवं पारदर्शिता की माँग कर रहे हैं, ताकि ये खुद ही आगे बढ़ कर अपना भविष्य गढ़ पाएं। और अगर राज्य सरकार इन्हें इनका यह संवैधानिक अधिकार भी नहीं दे पा रही, तो यह शर्मनाक है।
झारखंड की यह गठबंधन सरकार इन युवा अभ्यर्थियों का विश्वास खो चुकी है। सीआईडी एवं एसीबी जैसी राज्य सरकार की एजेंसियों पर ये छात्र भरोसा नहीं करते। उसका कारण यह है कि इसी एजेंसी ने JSSC-CGL में पूरा मामला पलट कर हाई कोर्ट को गुमराह किया था। क्या कोई बताएगा कि जब प्रारंभिक जांच में रटवाये गए 135 में 120 सवालों के सही मिलने की बात कही गई तो उस मामले को झूठा कैसे ठहराया गया?
आज एजेंसियां जिस अभय तिवारी को जेपीएससी नियुक्ति घोटाले का मास्टरमाइंड बता रही हैं, वह सीजीएल परीक्षा का सेकेंड टॉपर है, उसके परिवार के लोगों भी नौकरी मिली है, तो फिर उस प्रक्रिया को क्लीन चीट कैसे मिली? ऐसा उसने अकेले तो नहीं किया होगा? बाकी लोग कौन हैं? उन्हें क्यों बचाया जा रहा है? कुछ लोग कह रहे थे कि यह सब सीएमओ के संरक्षण में हो रहा है! लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद, इस पूरी प्रक्रिया को क्लीन चीट देने वाली एजेंसी पर छात्र कैसे भरोसा करें?
भारत के दूसरे राज्यों में जहाँ पेपर लीक को बड़ा अपराध माना जाता है, वहीं झारखंड में यह शायद पूरे नियुक्ति घोटाले का दस प्रतिशत भी नहीं है। झारखंड के ये विद्यार्थी रिजल्ट एवं नियुक्ति में देरी, OMR Sheet में हेर फेर, कट-ऑफ मार्क्स जारी नहीं होना, मेरिट लिस्ट की वैधता, परीक्षा एजेंसी से जुड़ी गड़बड़ी, पेपर लीक, सीटों की सेटिंग एवं बिक्री जैसे गंभीर आरोप लगा रहे हैं, लेकिन सरकार बेपरवाह है।
यहां सीना चीर कर दिखाने की जगह युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ बंद करने की जरूरत है। झारखंड के युवा पहले से ही सड़कों पर हैं। वे रोज देख रहे हैं कि किस की आंखें और कान कहाँ हैं और किसे बचाने के लिए एजेंसियां प्रयासरत हैं। अगर न्याय दिलवाने की मंशा है तो, हाल के वर्षों में हुई सभी नियुक्ति प्रक्रियाओं की सीबीआई जांच का आदेश दे दीजिए।
एक बात और, राज्य के सत्ताधारी दलों को जल-जंगल-जमीन की बात करने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि इनकी हकीकत पूरे राज्य ने नगड़ी (रांची) में देख लिया, जहाँ यही सरकार बिना अधिग्रहण के, एवं ग्राम सभा के निर्णय के खिलाफ जाकर आदिवासियों/ मूलवासियों की 227 एकड़ खेतिहर जमीन, पुलिस के बल पर जबरन कब्जा कर रही है।
इस छात्र विरोधी, युवा विरोधी, किसान विरोधी एवं आदिवासी- मूलवासी विरोधी सरकार की आँख, कान और इनका मकसद, सब इसी में दिख गया। आज छात्र संघर्षरत हैं, और बहुत जल्दी आदिवासी- मूलवासी किसान भी अपनी जमीनें बचाने के लिए इनके खिलाफ आंदोलन करने लगें, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।







